📷 चित्र स्रोत: Flickr (CC)
जीवनशैली
कुडने के पुरुषों ने चतुर्थी फुगड़ी परम्परा को जीवित रखा
✍️ The Times of India
🗓 16 सित. 2026, 05:17 AM
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कुडने में स्थानीय पुरुष चतुर्थी फुगड़ी नृत्य को जारी रखकर सांस्कृतिक परम्परा को संरक्षित कर रहे हैं।
कुडने के निवासियों ने चतुर्थी फुगड़ी, जो त्यौहार के चौथे दिन किया जाने वाला पारम्परिक लोकनृत्य है, को जीवित रखने का कार्य संभाला है। पुरुष गाँव के चौक में इकट्ठा होकर पारम्परिक वस्त्र पहनते हैं और समन्वित कदमों से वह नृत्य प्रस्तुत करते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को दर्शाता है।
समाज में बदलते जीवनशैली के बीच इस परम्परा को बचाने की इच्छा इस पहल में स्पष्ट दिखती है। नियमित अभ्यास और स्थानीय समारोहों में प्रदर्शन करके, प्रतिभागी इस कला को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का लक्ष्य रखते हैं।
संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी जमीनी पहलें लोक परम्पराओं के निरंतर अस्तित्व के लिये अत्यंत आवश्यक हैं, जो अन्यथा खो सकती हैं। कुडने समूह की प्रतिबद्धता इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय संरक्षक कैसे अमूर्त धरोहर को जीवंत बनाए रखते हैं।
इन प्रस्तुतियों ने आस-पास के गाँवों का भी ध्यान आकर्षित किया है, जिससे फुगड़ी का एक छोटा पुनरुत्थान शुरू हुआ है। आयोजक आशावादी हैं कि समुदाय का समर्थन जारी रहेगा और यह नृत्य जीवित रहेगा।
समग्र रूप से, कुडने के पुरुषों की इस प्रतिबद्धता से यह स्पष्ट होता है कि छोटे समुदाय कैसे भारत की विविध कला धरोहर को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
समाज में बदलते जीवनशैली के बीच इस परम्परा को बचाने की इच्छा इस पहल में स्पष्ट दिखती है। नियमित अभ्यास और स्थानीय समारोहों में प्रदर्शन करके, प्रतिभागी इस कला को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का लक्ष्य रखते हैं।
संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी जमीनी पहलें लोक परम्पराओं के निरंतर अस्तित्व के लिये अत्यंत आवश्यक हैं, जो अन्यथा खो सकती हैं। कुडने समूह की प्रतिबद्धता इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय संरक्षक कैसे अमूर्त धरोहर को जीवंत बनाए रखते हैं।
इन प्रस्तुतियों ने आस-पास के गाँवों का भी ध्यान आकर्षित किया है, जिससे फुगड़ी का एक छोटा पुनरुत्थान शुरू हुआ है। आयोजक आशावादी हैं कि समुदाय का समर्थन जारी रहेगा और यह नृत्य जीवित रहेगा।
समग्र रूप से, कुडने के पुरुषों की इस प्रतिबद्धता से यह स्पष्ट होता है कि छोटे समुदाय कैसे भारत की विविध कला धरोहर को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।