शराबबंदी कानून की धारा 73(e) पर पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला!
पटना। बिहार में शराबबंदी कानून के तहत दर्ज मामलों में तलाशी, जब्ती और पुलिस की कार्रवाई को लेकर पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार मद्यनि
शराबबंदी कानून की धारा 73(e) पर पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला!
पटना। बिहार में शराबबंदी कानून के तहत दर्ज मामलों में तलाशी, जब्ती और पुलिस की कार्रवाई को लेकर पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 73(e) में प्रयुक्त ‘May’ शब्द को अनिवार्य प्रावधान के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने शराब बरामदगी के एक मामले में आरोपी की याचिका खारिज कर दी।यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें आरोपी पुलिस की तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया को चुनौती देकर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हैं। किस मामले में आया फैसला?
यह मामला Akash Kumar v. State of Bihar से संबंधित है। पटना हाईकोर्ट में इसकी सुनवाई न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार की एकल पीठ ने की।
केस नंबर: Criminal Miscellaneous No. 60367 of 2018
- पुलिस केस: Patna GRP P.S. Case No. 61/2018
- फैसले की तारीख: 17 अगस्त 2026
- न्यायालय: पटना हाईकोर्ट
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार
पटना जंक्शन पर छह बोतल विदेशी शराब मिलने का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 27 फरवरी 2018 को पुलिस पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म पर गश्त कर रही थी। इसी दौरान डूरोंटो एक्सप्रेस के प्लेटफॉर्म संख्या तीन पर पहुंचने के बाद पुलिस की नजर लाल रंग का बैग लेकर जा रहे एक व्यक्ति पर पड़ी।पुलिस का आरोप था कि संबंधित व्यक्ति पुलिस को देखकर भागने की कोशिश करने लगा। इसके बाद उसे पकड़कर दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में बैग की तलाशी ली गई।अभियोजन के मुताबिक, बैग से छह बोतल विदेशी शराब बरामद हुईं। इनमें 100 पाइपर्स, VAT 69 और जॉनी वॉकर रेड लेबल ब्रांड की दो-दो बोतलें शामिल थीं।
पुलिस ने जब्ती सूची तैयार की और आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की।
हालांकि, ये तथ्य अभियोजन पक्ष के आरोप थे, जिन्हें आरोपी ने अदालत में चुनौती दी।
आरोपी ने तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि शराब की बरामदगी के दौरान कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।बचाव पक्ष का कहना था कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 73(e) के तहत तलाशी और जब्ती करने वाले पुलिस अधिकारी की रैंक को लेकर कानूनी शर्तें हैं। आरोपी की ओर से यह भी दलील दी गई कि तलाशी सहायक अवर निरीक्षक स्तर के अधिकारी ने की थी।बचाव पक्ष ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के अनुपालन पर भी सवाल उठाए। इसके अलावा जब्ती के गवाहों के बयानों में कथित विसंगतियों और आरोपपत्र दाखिल करने में देरी का मुद्दा उठाया गया।
आरोपी ने इन आधारों पर मजिस्ट्रेट द्वारा 27 मार्च 2018 को लिए गए संज्ञान के आदेश को रद्द करने की मांग की।
धारा 73(e) में ‘May’ शब्द पर अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 73(e) के प्रावधान पर विचार किया।अदालत ने कहा कि संबंधित प्रावधान में ‘May’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है और इसे ‘Shall’ के रूप में अनिवार्य नहीं बनाया गया है। वर्ष 2020 के संशोधन के बाद भी इस शब्द में बदलाव नहीं किया गया था।
अदालत ने इस आधार पर आरोपी की उस दलील को स्वीकार नहीं किया कि तलाशी की प्रक्रिया में कथित अनियमितता के कारण पूरी आपराधिक कार्यवाही स्वतः रद्द हो जानी चाहिए।हालांकि, इस टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस किसी भी परिस्थिति में तलाशी और जब्ती के नियमों की अनदेखी कर सकती है। प्रत्येक मामले में संबंधित कानून, उसके लागू प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच आवश्यक है।
गवाहों के बयान और आरोपपत्र में देरी पर क्या कहा?
बचाव पक्ष ने जब्ती के गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभासों का भी मुद्दा उठाया।हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में विसंगतियां और उनसे संबंधित बचाव की दलीलें उचित चरण पर विचारणीय हो सकती हैं। संज्ञान के आदेश को चुनौती देने वाली इस कार्यवाही में अदालत ने इन दलीलों को आपराधिक मुकदमा रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
आरोपपत्र निर्धारित अवधि से सात दिन देर से दाखिल होने की दलील पर भी अदालत ने राहत नहीं दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में देरी मात्र से मुकदमा स्वतः समाप्त नहीं हो जाता और न ही संज्ञान का आदेश अपने आप अवैध हो जाता है।
आरोपी की याचिका खारिज, मुकदमा जारी रहेगा
पटना हाईकोर्ट ने उपलब्ध सामग्री में प्रथमदृष्टया आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार पाया। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान रद्द करने योग्य नहीं है।
इसके बाद न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार की पीठ ने Criminal Miscellaneous No. 60367/2018 को गुण-दोष से रहित मानते हुए खारिज कर दिया।इसका परिणाम यह हुआ कि आरोपी को इस याचिका के आधार पर राहत नहीं मिली और संबंधित आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं हुई।
पटना। बिहार में शराबबंदी कानून के तहत दर्ज मामलों में तलाशी, जब्ती और पुलिस की कार्रवाई को लेकर पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 73(e) में प्रयुक्त ‘May’ शब्द को अनिवार्य प्रावधान के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने शराब बरामदगी के एक मामले में आरोपी की याचिका खारिज कर दी।यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें आरोपी पुलिस की तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया को चुनौती देकर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हैं। किस मामले में आया फैसला?
यह मामला Akash Kumar v. State of Bihar से संबंधित है। पटना हाईकोर्ट में इसकी सुनवाई न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार की एकल पीठ ने की।
केस नंबर: Criminal Miscellaneous No. 60367 of 2018
- पुलिस केस: Patna GRP P.S. Case No. 61/2018
- फैसले की तारीख: 17 अगस्त 2026
- न्यायालय: पटना हाईकोर्ट
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार
पटना जंक्शन पर छह बोतल विदेशी शराब मिलने का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 27 फरवरी 2018 को पुलिस पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म पर गश्त कर रही थी। इसी दौरान डूरोंटो एक्सप्रेस के प्लेटफॉर्म संख्या तीन पर पहुंचने के बाद पुलिस की नजर लाल रंग का बैग लेकर जा रहे एक व्यक्ति पर पड़ी।पुलिस का आरोप था कि संबंधित व्यक्ति पुलिस को देखकर भागने की कोशिश करने लगा। इसके बाद उसे पकड़कर दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में बैग की तलाशी ली गई।अभियोजन के मुताबिक, बैग से छह बोतल विदेशी शराब बरामद हुईं। इनमें 100 पाइपर्स, VAT 69 और जॉनी वॉकर रेड लेबल ब्रांड की दो-दो बोतलें शामिल थीं।
पुलिस ने जब्ती सूची तैयार की और आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की।
हालांकि, ये तथ्य अभियोजन पक्ष के आरोप थे, जिन्हें आरोपी ने अदालत में चुनौती दी।
आरोपी ने तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि शराब की बरामदगी के दौरान कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।बचाव पक्ष का कहना था कि बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 73(e) के तहत तलाशी और जब्ती करने वाले पुलिस अधिकारी की रैंक को लेकर कानूनी शर्तें हैं। आरोपी की ओर से यह भी दलील दी गई कि तलाशी सहायक अवर निरीक्षक स्तर के अधिकारी ने की थी।बचाव पक्ष ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के अनुपालन पर भी सवाल उठाए। इसके अलावा जब्ती के गवाहों के बयानों में कथित विसंगतियों और आरोपपत्र दाखिल करने में देरी का मुद्दा उठाया गया।
आरोपी ने इन आधारों पर मजिस्ट्रेट द्वारा 27 मार्च 2018 को लिए गए संज्ञान के आदेश को रद्द करने की मांग की।
धारा 73(e) में ‘May’ शब्द पर अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 73(e) के प्रावधान पर विचार किया।अदालत ने कहा कि संबंधित प्रावधान में ‘May’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है और इसे ‘Shall’ के रूप में अनिवार्य नहीं बनाया गया है। वर्ष 2020 के संशोधन के बाद भी इस शब्द में बदलाव नहीं किया गया था।
अदालत ने इस आधार पर आरोपी की उस दलील को स्वीकार नहीं किया कि तलाशी की प्रक्रिया में कथित अनियमितता के कारण पूरी आपराधिक कार्यवाही स्वतः रद्द हो जानी चाहिए।हालांकि, इस टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस किसी भी परिस्थिति में तलाशी और जब्ती के नियमों की अनदेखी कर सकती है। प्रत्येक मामले में संबंधित कानून, उसके लागू प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच आवश्यक है।
गवाहों के बयान और आरोपपत्र में देरी पर क्या कहा?
बचाव पक्ष ने जब्ती के गवाहों के बयानों में कथित विरोधाभासों का भी मुद्दा उठाया।हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में विसंगतियां और उनसे संबंधित बचाव की दलीलें उचित चरण पर विचारणीय हो सकती हैं। संज्ञान के आदेश को चुनौती देने वाली इस कार्यवाही में अदालत ने इन दलीलों को आपराधिक मुकदमा रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
आरोपपत्र निर्धारित अवधि से सात दिन देर से दाखिल होने की दलील पर भी अदालत ने राहत नहीं दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में देरी मात्र से मुकदमा स्वतः समाप्त नहीं हो जाता और न ही संज्ञान का आदेश अपने आप अवैध हो जाता है।
आरोपी की याचिका खारिज, मुकदमा जारी रहेगा
पटना हाईकोर्ट ने उपलब्ध सामग्री में प्रथमदृष्टया आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार पाया। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया संज्ञान रद्द करने योग्य नहीं है।
इसके बाद न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार की पीठ ने Criminal Miscellaneous No. 60367/2018 को गुण-दोष से रहित मानते हुए खारिज कर दिया।इसका परिणाम यह हुआ कि आरोपी को इस याचिका के आधार पर राहत नहीं मिली और संबंधित आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं हुई।