📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Gaurav Dhwaj Khadka
धर्म
बिना महिलाओं के बढ़ते पुरुष छठव्रती, सिंदूर रिवाज पर चर्चा
✍️ Amar Ujala · Bihar
🗓 07 नव. 2026, 11:02 AM
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छठ पूजा में पुरुषों की भागीदारी बढ़ने से पारंपरिक सिंदूर रस्म को बिना महिला उपस्थितियों के कैसे निभाया जाए, इस पर चर्चा छिड़ी है।
छठ पूजा, जो सूर्य देवता को समर्पित एक प्रमुख त्यौहार है और बिहार व आसपास के क्षेत्रों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है, में परम्परागत रूप से महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, विशेषकर सिंदूर रिवाज में। हाल के वर्षों में पुरुषों द्वारा अकेले ही इस पूजा को पूरा करने की प्रवृत्ति में स्पष्ट वृद्धि देखी जा रही है।
इन पुरुष‑केवल समूहों के सामने सबसे बड़ा सवाल सिंदूर की रस्म है, जहाँ सामान्यतः विवाहित महिलाएँ सूर्य की मूर्ति पर सिंदूर लगाती हैं, जो वैवाहिक सुख और भक्ति का प्रतीक है। महिला अनुपस्थिति में, पुरुष या तो इस चरण को छोड़ देते हैं या किसी पुरुष परिवार सदस्य द्वारा इसे प्रतीकात्मक रूप से करवाते हैं।
संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि मूल प्रार्थनाएँ और उपवास समान रहते हुए, लिंग सहभागिता में यह बदलाव बिहार के ग्रामीण सामाजिक परिवर्तनों को दर्शाता है। वे यह भी कहते हैं कि छठ का मूल उद्देश्य—सूर्य को धन्यवाद देना और कल्याण की कामना—परिवर्तित नहीं हुआ है, केवल परम्पराओं को नई परिस्थितियों में ढालने की कोशिश की जा रही है।
यह प्रवृत्ति यह संकेत देती है कि भक्ति और परम्परा लिंग सीमाओं से परे भी प्रकट हो सकती है, जबकि त्यौहार की आध्यात्मिक भावना बरकरार रहती है।
इन पुरुष‑केवल समूहों के सामने सबसे बड़ा सवाल सिंदूर की रस्म है, जहाँ सामान्यतः विवाहित महिलाएँ सूर्य की मूर्ति पर सिंदूर लगाती हैं, जो वैवाहिक सुख और भक्ति का प्रतीक है। महिला अनुपस्थिति में, पुरुष या तो इस चरण को छोड़ देते हैं या किसी पुरुष परिवार सदस्य द्वारा इसे प्रतीकात्मक रूप से करवाते हैं।
संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि मूल प्रार्थनाएँ और उपवास समान रहते हुए, लिंग सहभागिता में यह बदलाव बिहार के ग्रामीण सामाजिक परिवर्तनों को दर्शाता है। वे यह भी कहते हैं कि छठ का मूल उद्देश्य—सूर्य को धन्यवाद देना और कल्याण की कामना—परिवर्तित नहीं हुआ है, केवल परम्पराओं को नई परिस्थितियों में ढालने की कोशिश की जा रही है।
यह प्रवृत्ति यह संकेत देती है कि भक्ति और परम्परा लिंग सीमाओं से परे भी प्रकट हो सकती है, जबकि त्यौहार की आध्यात्मिक भावना बरकरार रहती है।