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केंद्र सरकार ने एथेनॉल उत्पादन पर सख्ती, मकई की मांग में बढ़ोतरी के आसार
नई दिल्ली: खाद्य सुरक्षा के लिए चावल और गन्ने पर एथेनॉल उत्पादन सीमित करने के बाद, डिस्टिलरी कंपनियाँ मकई की ओर रुख कर सकती हैं, जिससे मकई की कीमतों में उछाल की संभावना है।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने खाद्य सुरक्षा और अनाज की कीमतों को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से एथेनॉल उत्पादन में खाद्यान्न के इस्तेमाल पर सख्ती बढ़ा दी है। चावल और गन्ने से एथेनॉल उत्पादन पर लगाई गई सीमाओं के बाद अब डिस्टिलरी कंपनियों का रुख मकई की ओर बढ़ने की संभावना है, जिससे मकई की कीमतों में उछाल आने के आसार जताए जा रहे हैं।
नई व्यवस्था के तहत भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अतिरिक्त चावल से शुरुआती तीन तिमाहियों में अधिकतम 324 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन की सीमा तय की गई है, जबकि टूटे और खराब खाद्यान्न से 160 करोड़ लीटर एथेनॉल बनाने की अनुमति होगी। इस प्रकार दोनों स्रोतों से कुल 484 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन की सीमा निर्धारित की गई है।
तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने वर्ष 2026‑27 के लिए 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की मांग को लेकर टेंडर जारी किया है। मांग और उपलब्ध खाद्यान्न के बीच अंतर को पूरा करने के लिए मकई पर निर्भरता बढ़ सकती है। एथेनॉल उद्योग में मकई की मांग 1.3 करोड़ टन से बढ़कर लगभग 1.6 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे वर्तमान में 27 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर चल रहे मकई के दाम और ऊपर जा सकते हैं।
मकई की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल किसानों और एथेनॉल कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। पोल्ट्री उद्योग में मकई प्रमुख पशु आहार है, जिसकी कीमत बढ़ने से मुर्गी पालन की लागत और चिकन व अंडों की कीमतों पर असर पड़ेगा। डेयरी उद्योग में भी पशु आहार महंगा होने से दूध उत्पादन की लागत बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा, मकई से बनने वाले स्टार्च और लिक्विड ग्लूकोज की कीमतों में वृद्धि होने पर खाद्य प्रसंस्करण और FMCG उद्योग भी प्रभावित हो सकते हैं।
नई व्यवस्था के तहत भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अतिरिक्त चावल से शुरुआती तीन तिमाहियों में अधिकतम 324 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन की सीमा तय की गई है, जबकि टूटे और खराब खाद्यान्न से 160 करोड़ लीटर एथेनॉल बनाने की अनुमति होगी। इस प्रकार दोनों स्रोतों से कुल 484 करोड़ लीटर एथेनॉल उत्पादन की सीमा निर्धारित की गई है।
तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने वर्ष 2026‑27 के लिए 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की मांग को लेकर टेंडर जारी किया है। मांग और उपलब्ध खाद्यान्न के बीच अंतर को पूरा करने के लिए मकई पर निर्भरता बढ़ सकती है। एथेनॉल उद्योग में मकई की मांग 1.3 करोड़ टन से बढ़कर लगभग 1.6 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे वर्तमान में 27 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर चल रहे मकई के दाम और ऊपर जा सकते हैं।
मकई की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल किसानों और एथेनॉल कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। पोल्ट्री उद्योग में मकई प्रमुख पशु आहार है, जिसकी कीमत बढ़ने से मुर्गी पालन की लागत और चिकन व अंडों की कीमतों पर असर पड़ेगा। डेयरी उद्योग में भी पशु आहार महंगा होने से दूध उत्पादन की लागत बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा, मकई से बनने वाले स्टार्च और लिक्विड ग्लूकोज की कीमतों में वृद्धि होने पर खाद्य प्रसंस्करण और FMCG उद्योग भी प्रभावित हो सकते हैं।