📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Flashthomsom
राजनीति
झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य को मानवाधिकार आयोग को 3 महीने में पुनर्जीवित करने का आदेश दिया
✍️ The Indian Express
🗓 29 सित. 2026, 01:02 AM
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झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर झारखंड मानवाधिकार आयोग को पुनर्स्थापित करने का निर्देश दिया।
झारखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह झारखंड मानवाधिकार आयोग को तीन महीने के भीतर सक्रिय रूप से पुनर्स्थापित करे। यह आदेश इस बात को दर्शाता है कि आयोग कई वर्षों से निष्क्रिय रहा है, जिससे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में कमी आई है।
न्यायालय ने कहा कि एक निचले स्तर का आयोग मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच और सलाह देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और उसकी अनुपस्थिति से न्यायिक निगरानी कमजोर हो जाती है। समयसीमा निर्धारित कर कोर्ट ने आयोग को शीघ्र पुनः कार्यशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
राज्य प्राधिकरणों को अब अदालत को एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें आयोग के पुनर्गठन, सदस्य नियुक्ति और आवश्यक संसाधनों के आवंटन के कदमों का विवरण होगा। यदि यह समय सीमा पूरी नहीं हुई तो अतिरिक्त न्यायिक कार्रवाई हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्देश राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संस्थाओं को सुदृढ़ करने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है, जिनकी कई राज्यों में निष्क्रियता की आलोचना की गई है। इस फैसले से अन्य राज्य सरकारों को भी अपने आयोगों की स्थिति पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा मिल सकती है।
समग्र रूप से यह निर्णय संविधान द्वारा गारंटीकृत नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को उजागर करता है और यह सुनिश्चित करता है कि अधिकार संरक्षण के तंत्र कार्यशील रहें।
न्यायालय ने कहा कि एक निचले स्तर का आयोग मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच और सलाह देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और उसकी अनुपस्थिति से न्यायिक निगरानी कमजोर हो जाती है। समयसीमा निर्धारित कर कोर्ट ने आयोग को शीघ्र पुनः कार्यशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
राज्य प्राधिकरणों को अब अदालत को एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें आयोग के पुनर्गठन, सदस्य नियुक्ति और आवश्यक संसाधनों के आवंटन के कदमों का विवरण होगा। यदि यह समय सीमा पूरी नहीं हुई तो अतिरिक्त न्यायिक कार्रवाई हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्देश राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संस्थाओं को सुदृढ़ करने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है, जिनकी कई राज्यों में निष्क्रियता की आलोचना की गई है। इस फैसले से अन्य राज्य सरकारों को भी अपने आयोगों की स्थिति पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा मिल सकती है।
समग्र रूप से यह निर्णय संविधान द्वारा गारंटीकृत नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को उजागर करता है और यह सुनिश्चित करता है कि अधिकार संरक्षण के तंत्र कार्यशील रहें।