📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / National Museum of American History
राजनीति
भारत का 1991 का सोने का वादा: आर्थिक नीति में एक मोड़
✍️ ThePrint
🗓 06 अक्टू. 2026, 07:03 AM
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1991 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय कर्ज़ के भुगतान के लिए सोने का वादा किया, जिससे राजनीतिक उथल-पुथल के बीच आर्थिक नीति में निर्णायक बदलाव आया।
जनवरी 1991 में भारत को गंभीर भुगतान संतुलन संकट का सामना करना पड़ा, जब विदेशी भंडार कुछ ही महीनों के आयात के बराबर रह गया।
तब के प्रधानमंत्री पी.वी. नारायण राव के नेतृत्व में सरकार ने अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता से ऋण सुरक्षित करने के लिए सोने के भंडार को गिरवी रखने का निर्णय लिया।
यह कदम पहले कभी नहीं लिया गया था, क्योंकि भारत ने अपने सोने के भंडार को अंतरराष्ट्रीय उधारी के लिए गिरवी नहीं रखा था।
इस वादे से न केवल डिफ़ॉल्ट से बचाव हुआ, बल्कि यह अर्थव्यवस्था को उदारीकृत करने के लिए एक व्यापक बदलाव का संकेत भी बना, जो उसी वर्ष बाद में हुए सुधारों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।
तब के प्रधानमंत्री पी.वी. नारायण राव के नेतृत्व में सरकार ने अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता से ऋण सुरक्षित करने के लिए सोने के भंडार को गिरवी रखने का निर्णय लिया।
यह कदम पहले कभी नहीं लिया गया था, क्योंकि भारत ने अपने सोने के भंडार को अंतरराष्ट्रीय उधारी के लिए गिरवी नहीं रखा था।
इस वादे से न केवल डिफ़ॉल्ट से बचाव हुआ, बल्कि यह अर्थव्यवस्था को उदारीकृत करने के लिए एक व्यापक बदलाव का संकेत भी बना, जो उसी वर्ष बाद में हुए सुधारों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।