विदेश
हुनर से लिखी आत्मनिर्भरता की नई इबारत, दिव्यांग हाथों ने बांटी खुशियां!
Rajesh mandal
नोएडा, 17 अक्टूबर।* जब हुनर को हौसले का साथ मिले तो किस्मत भी बदल जाती है। फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए फाउंडेशन ने अपनी पहली स्मॉल स्किल इंडस्ट्री शुरू की है, जहां दिव्यांगजनों के हाथों से बनी डिस्पोजेबल प्लेट्स अब लोगों तक पहुंच रही हैं।
इस डिस्पोजेबल प्लेट्स इंडस्ट्री का उद्घाटन सेंटर मैनेजर सुरभि जैन ने किया। खास बात यह रही कि इस नेक पहल में प्रसिद्ध फाइनेंस एजुकेटर और मोटिवेशनल स्पीकर सागर सिन्हा ने सहयोग दिया। उन्होंने न सिर्फ प्लेट्स को स्पॉन्सर किया, बल्कि यह भावुक अपील भी की कि ये प्लेट्स दिव्यांगजनों के हाथों से ही भंडारों में बांटी जाएं, ताकि उनके चेहरे पर आत्मसम्मान की मुस्कान लौट सके।
नवरात्रि के पावन दिनों में जब शहर में भंडारे चल रहे थे, तो करीब 7000 प्लेट्स उन्हीं विशेष हाथों ने श्रद्धालुओं तक पहुंचाईं, जिन्हें अक्सर समाज सहानुभूति की नजर से देखता है। थाली में प्रसाद नहीं, आत्मविश्वास परोसा जा रहा था।
फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ महिपाल सिंह ने कहा असली राष्ट्र निर्माण वही है, जो आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में लाए। सागर सिन्हा जैसे सहयोगी ही बदलाव के असली सारथी हैं।
उन्होंने बताया कि यह तो बस शुरुआत है। आने वाले छह महीनों में ऐसी कई और इंडस्ट्रीज शुरू की जाएंगी, ताकि दिव्यांगता अभिशाप नहीं, हुनर की पहचान बने।
इस डिस्पोजेबल प्लेट्स इंडस्ट्री का उद्घाटन सेंटर मैनेजर सुरभि जैन ने किया। खास बात यह रही कि इस नेक पहल में प्रसिद्ध फाइनेंस एजुकेटर और मोटिवेशनल स्पीकर सागर सिन्हा ने सहयोग दिया। उन्होंने न सिर्फ प्लेट्स को स्पॉन्सर किया, बल्कि यह भावुक अपील भी की कि ये प्लेट्स दिव्यांगजनों के हाथों से ही भंडारों में बांटी जाएं, ताकि उनके चेहरे पर आत्मसम्मान की मुस्कान लौट सके।
नवरात्रि के पावन दिनों में जब शहर में भंडारे चल रहे थे, तो करीब 7000 प्लेट्स उन्हीं विशेष हाथों ने श्रद्धालुओं तक पहुंचाईं, जिन्हें अक्सर समाज सहानुभूति की नजर से देखता है। थाली में प्रसाद नहीं, आत्मविश्वास परोसा जा रहा था।
फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ महिपाल सिंह ने कहा असली राष्ट्र निर्माण वही है, जो आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में लाए। सागर सिन्हा जैसे सहयोगी ही बदलाव के असली सारथी हैं।
उन्होंने बताया कि यह तो बस शुरुआत है। आने वाले छह महीनों में ऐसी कई और इंडस्ट्रीज शुरू की जाएंगी, ताकि दिव्यांगता अभिशाप नहीं, हुनर की पहचान बने।