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हजारीबाग वन विभाग में घमासान: वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोपों की जांच रिपोर्ट एक साल पुरानी, PCCF को भेजा रिमाइंडर
हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल के वरिष्ठ अधिकारियों पर लगे गंभीर आरोपों की जांच रिपोर्ट एक साल से लंबित है। राज्यपाल और केंद्र सरकार के दखल के बाद वन विभाग ने सक्रियता दिखाते हुए PCCF झारखंड को रिमाइंडर भेजा है।
हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल के वरिष्ठ अधिकारियों पर लगे गंभीर आरोपों का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। राज्यपाल सचिवालय और भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से पत्राचार के बाद वन विभाग पूरी तरह सक्रिय हो गया है। विभाग ने एक साल से लंबित जांच रिपोर्ट पर सख्त रुख अपनाते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF), झारखंड को रिमाइंडर भेजा है और जल्द से जल्द जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
यह पूरा मामला सेवानिवृत्त सहायक वन संरक्षक अविनाश कुमार परमार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों से जुड़ा है। परमार ने जिन प्रमुख अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है, उनमें आर.एन. मिश्रा (तत्कालीन क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक), ममता प्रियदर्शी (वन संरक्षक) और मौन प्रकाश (डीएफओ, हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल) शामिल हैं। हालांकि, इन तमाम आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
वन विभाग के विशेष सचिव राजदीप संजय लाल जॉन द्वारा जारी पत्र के अनुसार, विभाग ने पहले ही मुख्य वन संरक्षक (निगरानी), झारखंड से मामले की जांच कराकर मंतव्य सहित रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन एक लंबा समय बीत जाने के बाद भी प्रतिवेदन विभाग को प्राप्त नहीं हुआ। इसी विलंब को देखते हुए विभाग ने अब दोबारा पत्र जारी कर शीघ्र रिपोर्ट की मांग की है, जिसकी प्रतिलिपि शिकायतकर्ता अविनाश कुमार परमार को भी भेजी गई है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि तत्कालीन वन संरक्षक कार्यालय की ओर से गठित दो सदस्यीय जांच समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन तत्कालीन वन संरक्षक ममता प्रियदर्शी ने करीब पांच महीने तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। साथ ही, परमार का दावा है कि 23 जुलाई 2025 को तत्कालीन क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक आर.एन. मिश्रा द्वारा जारी पत्र में जांच रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए जांच करने वाले अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया था, जिसे उन्होंने पक्षपातपूर्ण कार्रवाई के रूप में दर्शाया है।
डीएफओ मौन प्रकाश की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस डीएफओ के खिलाफ जांच के लिए समिति का गठन किया गया था, उसी अधिकारी से अंततः जांच रिपोर्ट की समीक्षा करा ली गई, जिसमें जांच अधिकारियों को दोषी ठहरा दिया गया। इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, राज्यपाल और भारत सरकार को पत्र लिखकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
यह पूरा मामला सेवानिवृत्त सहायक वन संरक्षक अविनाश कुमार परमार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों से जुड़ा है। परमार ने जिन प्रमुख अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है, उनमें आर.एन. मिश्रा (तत्कालीन क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक), ममता प्रियदर्शी (वन संरक्षक) और मौन प्रकाश (डीएफओ, हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल) शामिल हैं। हालांकि, इन तमाम आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
वन विभाग के विशेष सचिव राजदीप संजय लाल जॉन द्वारा जारी पत्र के अनुसार, विभाग ने पहले ही मुख्य वन संरक्षक (निगरानी), झारखंड से मामले की जांच कराकर मंतव्य सहित रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन एक लंबा समय बीत जाने के बाद भी प्रतिवेदन विभाग को प्राप्त नहीं हुआ। इसी विलंब को देखते हुए विभाग ने अब दोबारा पत्र जारी कर शीघ्र रिपोर्ट की मांग की है, जिसकी प्रतिलिपि शिकायतकर्ता अविनाश कुमार परमार को भी भेजी गई है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि तत्कालीन वन संरक्षक कार्यालय की ओर से गठित दो सदस्यीय जांच समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन तत्कालीन वन संरक्षक ममता प्रियदर्शी ने करीब पांच महीने तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। साथ ही, परमार का दावा है कि 23 जुलाई 2025 को तत्कालीन क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक आर.एन. मिश्रा द्वारा जारी पत्र में जांच रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए जांच करने वाले अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया था, जिसे उन्होंने पक्षपातपूर्ण कार्रवाई के रूप में दर्शाया है।
डीएफओ मौन प्रकाश की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस डीएफओ के खिलाफ जांच के लिए समिति का गठन किया गया था, उसी अधिकारी से अंततः जांच रिपोर्ट की समीक्षा करा ली गई, जिसमें जांच अधिकारियों को दोषी ठहरा दिया गया। इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, राज्यपाल और भारत सरकार को पत्र लिखकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।