📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Bollywood Hungama
धर्म
गया में विदेश से ऑनलाइन पिंडदान, अजय गुप्ता का पितृ कर्म
✍️ Amar Ujala · Bihar
🗓 02 अक्टू. 2026, 02:32 PM
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गया के विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले में, विदेश में रह रहे अजय गुप्ता ने फल्गु नदी के देवघाट पर वीडियो कॉल के माध्यम से पिंडदान किया।
गया के पितृपक्ष मेले में देवघाट पर फल्गु नदी के किनारे पिंडदान के दौरान, एक अनोखा दृश्य सामने आया। विदेश में रहने वाले अजय गुप्ता ने वीडियो कॉल के ज़रिए पिंडदान का अनुष्ठान किया, जिससे दूर से ही पितृ कर्म पूरा हुआ।
गया के मेले के आयोजकों ने देवघाट पर एक स्क्रीन और ऑडियो लिंक स्थापित किया, ताकि गुप्ता के लाइव प्रसारण को दर्शकों तक पहुँचाया जा सके। दर्शक अपनी श्रद्धा के साथ गुप्ता के शब्दों को सुनते रहे और अनुष्ठान के साथ जुड़ते रहे।
इस घटना ने मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा पैदा की, क्योंकि यह दिखाता है कि कैसे तकनीक के माध्यम से परंपरागत रीति-रिवाज़ों को दूरस्थ रूप से भी निभाया जा सकता है। पिंडदान के सभी चरण पारंपरिक नियमों के अनुसार ही पूरे किए गए।
आयोजकों ने बताया कि यह व्यवस्था स्थानीय नियमों के अनुरूप थी और मेले के सामान्य प्रवाह में कोई बाधा नहीं आई। साथ ही, उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पिंडदान के दौरान सभी धार्मिक प्रार्थनाएँ और अनुष्ठान स्थल पर मौजूद पुरोहितों द्वारा ही किए गए।
यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक के साथ परंपरागत पितृ कर्म को कैसे अनुकूलित किया जा सकता है, ताकि भौगोलिक दूरी के बावजूद श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए अनुष्ठान कर सकें।
गया के मेले के आयोजकों ने देवघाट पर एक स्क्रीन और ऑडियो लिंक स्थापित किया, ताकि गुप्ता के लाइव प्रसारण को दर्शकों तक पहुँचाया जा सके। दर्शक अपनी श्रद्धा के साथ गुप्ता के शब्दों को सुनते रहे और अनुष्ठान के साथ जुड़ते रहे।
इस घटना ने मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा पैदा की, क्योंकि यह दिखाता है कि कैसे तकनीक के माध्यम से परंपरागत रीति-रिवाज़ों को दूरस्थ रूप से भी निभाया जा सकता है। पिंडदान के सभी चरण पारंपरिक नियमों के अनुसार ही पूरे किए गए।
आयोजकों ने बताया कि यह व्यवस्था स्थानीय नियमों के अनुरूप थी और मेले के सामान्य प्रवाह में कोई बाधा नहीं आई। साथ ही, उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पिंडदान के दौरान सभी धार्मिक प्रार्थनाएँ और अनुष्ठान स्थल पर मौजूद पुरोहितों द्वारा ही किए गए।
यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक के साथ परंपरागत पितृ कर्म को कैसे अनुकूलित किया जा सकता है, ताकि भौगोलिक दूरी के बावजूद श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए अनुष्ठान कर सकें।