📷 चित्र स्रोत: Flickr (CC)
कृषि
सीएक्यूएम ने पंजाब-हरियाणा के साथ धुंधली जलाने के अनुमान प्रोटोकॉल को सुधारने के लिए बातचीत की
✍️ The Hindu
🗓 04 सित. 2026, 06:36 AM
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केन्द्रीय कृषि गुणवत्ता प्रबंधन (सीएक्यूएम) एजेंसी पंजाब और हरियाणा सरकारों के साथ धुंधली जलाने के अनुमान के तरीके को सुधारने के लिए चर्चा कर रही है।
नई दिल्ली – केन्द्रीय कृषि गुणवत्ता प्रबंधन (सीएक्यूएम) ने पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों के साथ धुंधली जलाने के अनुमान प्रोटोकॉल को पुनः व्यवस्थित करने के लिए चर्चा शुरू की है। अधिकारियों ने बताया कि वर्तमान में उपग्रह छवियों और किसानों की रिपोर्टों पर आधारित अनुमान अक्सर असंगत होते हैं, जिससे नीति‑निर्धारण और मुआवजा योजना दोनों प्रभावित होते हैं।
इस सप्ताह हुई कई बैठकों में सीएक्यूएम ने उच्च‑रिज़ॉल्यूशन रिमोट‑सेंसिंग तकनीक, जमीनी सत्यापन और एक मानकीकृत रिपोर्टिंग फॉर्मेट को जोड़ने की योजना पेश की। इससे जलाए गए फसल अवशेष की मात्रा का सटीक आंकड़ा प्राप्त होगा, जो कटाई‑पश्चात हवा की गुणवत्ता में गिरावट का मुख्य कारण है।
पंजाब और हरियाणा दोनों सरकारों ने इस पहल का स्वागत किया, यह कहा कि सही आंकड़े ही सब्सिडी‑युक्त मशीनरी, अवशेष प्रबंधन और जलाने पर कड़ी कार्रवाई जैसे लक्षित उपायों को संभव बनाते हैं। संशोधित प्रोटोकॉल का मसौदा अगले तिमाही के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है।
किसान संघों और पर्यावरणीय NGOs को भी अंतिम रूप देने से पहले अपना फीडबैक देने के लिए आमंत्रित किया गया है। सफल होने पर यह नई पद्धति अन्य भारतीय राज्यों में भी कृषि‑जनित प्रदूषण से निपटने के लिए मॉडल बन सकती है।
इस सप्ताह हुई कई बैठकों में सीएक्यूएम ने उच्च‑रिज़ॉल्यूशन रिमोट‑सेंसिंग तकनीक, जमीनी सत्यापन और एक मानकीकृत रिपोर्टिंग फॉर्मेट को जोड़ने की योजना पेश की। इससे जलाए गए फसल अवशेष की मात्रा का सटीक आंकड़ा प्राप्त होगा, जो कटाई‑पश्चात हवा की गुणवत्ता में गिरावट का मुख्य कारण है।
पंजाब और हरियाणा दोनों सरकारों ने इस पहल का स्वागत किया, यह कहा कि सही आंकड़े ही सब्सिडी‑युक्त मशीनरी, अवशेष प्रबंधन और जलाने पर कड़ी कार्रवाई जैसे लक्षित उपायों को संभव बनाते हैं। संशोधित प्रोटोकॉल का मसौदा अगले तिमाही के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है।
किसान संघों और पर्यावरणीय NGOs को भी अंतिम रूप देने से पहले अपना फीडबैक देने के लिए आमंत्रित किया गया है। सफल होने पर यह नई पद्धति अन्य भारतीय राज्यों में भी कृषि‑जनित प्रदूषण से निपटने के लिए मॉडल बन सकती है।