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22 अक्टू. 2026•
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कृषि

विदिशा की दयोदय गौशाला का 60 लाख रुपये की लागत से विकसित '5-जे मॉडल' पर्यावरण और गौसंवर्धन का उत्कृष्ट उदाहरण

✍️ रिपोर्टर: Pranav Gaur 🗓 22 अक्टू. 2026, 10:39 AM 👁 16
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मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में दयोदय गौशाला उदयगिरि द्वारा शुरू किया गया साइलेज निर्माण मॉडल पराली प्रबंधन, जल संरक्षण और गोवंश को पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने का प्रभावी समाधान बनकर उभरा है।

विदिशा की दयोदय गौशाला, उदयगिरि द्वारा लगभग 60 लाख रुपये की लागत से विकसित किया गया '5-जे मॉडल' पर्यावरण संरक्षण और गौसंवर्धन का एक अभिनव उदाहरण बनकर उभर रहा है। गौशाला अध्यक्ष आकाश जैन के नेतृत्व में संचालित यह व्यवस्था दुग्धिया अवस्था की मक्के की फसल से साइलेज तैयार करती है, जो अचार की तर्ज पर वर्षभर सुरक्षित रहता है। इस मॉडल के माध्यम से किसानों को खड़ी फसल का उचित मूल्य मिलने के साथ-साथ खेतों में पराली जलाने की आवश्यकता भी समाप्त हो रही है।

जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन पर आधारित इस '5-जे मॉडल' से जल संरक्षण और भूमि की उर्वरता को बरकरार रखने में सहायता मिलती है। खेतों से फसल अवशेष हट जाने से भूमि शीघ्र अगली फसल के लिए तैयार हो जाती है और नमी सुरक्षित रहती है, जिससे अगली फसल की पलेवा में कम पानी की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही, पराली न जलने से भूमि के उपयोगी सूक्ष्म जीव, केंचुए और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं, जिससे किसानों को उर्वरकों पर होने वाला अतिरिक्त खर्च भी कम होता है।

गोवंश के स्वास्थ्य और उत्पादन के लिहाज से भी यह मॉडल लाभकारी साबित हो रहा है। दुग्धिया मक्के से तैयार साइलेज ऊर्जा, प्रोटीन और पोषण से भरपूर होता है, जिससे गोवंश को वर्षभर गुणवत्तापूर्ण चारा उपलब्ध रहता है। इससे न केवल पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार होता है, बल्कि दुग्ध उत्पादन भी बढ़ता है और गौशालाओं की चारा व्यवस्था अधिक सुदृढ़ बनती है।

पर्यावरण के लिहाज से भी इस पहल का सकारात्मक प्रभाव देखा जा रहा है। पराली न जलने से वायु प्रदूषण, धुआं और धूलकणों में कमी आती है, जिससे आमजन को स्वच्छ वातावरण मिलता है और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कम होते हैं। गौशाला अध्यक्ष आकाश जैन ने बताया कि किसानों को एक व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराकर पराली जलाने की समस्या को समाप्त किया जा सकता है। यदि फसल को समय पर काटकर साइलेज में परिवर्तित किया जाए, तो यह न केवल गोवंश के लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध कराता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और कृषि हित में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मॉडल मध्यप्रदेश सहित अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक अनुकरणीय और टिकाऊ व्यवस्था के रूप में उभर रहा है।
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