धर्म
दीपों की रोशनी में फिर जीवंत हुआ अयोध्या का दिव्य वैभव, सनातन संस्कृति की दिखी अनुपम छटा
त्रेतायुग की स्मृतियों को साकार करती अयोध्या, प्रभु श्रीराम के स्वागत की परंपरा दीपोत्सव में फिर हुई जीवंत
अयोध्या। गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस की ये पंक्तियां “अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥” आज अयोध्या के दिव्य और भव्य स्वरूप को सजीव कर रही हैं। जिस अयोध्या नगरी ने त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के आगमन पर दीपों और उत्सवों के साथ उनका स्वागत किया था, उसी पावन नगरी का सनातन वैभव आज दीपों की रोशनी में एक बार फिर जीवंत होता दिखाई दे रहा है। दीपों की जगमगाहट, भव्य सजावट और आध्यात्मिक वातावरण से रामनगरी का कण-कण भक्तिमय नजर आ रहा है। अयोध्या का यह दिव्य स्वरूप भारतीय संस्कृति, आस्था और परंपराओं की उस गौरवशाली विरासत का स्मरण कराता है, जो सदियों से देश की आध्यात्मिक पहचान रही है। प्रभु श्रीराम की नगरी में दीपों का यह प्रकाश केवल उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि मर्यादा, धर्म, सत्य और सनातन परंपरा के प्रति अटूट आस्था का संदेश भी दे रहा है। अयोध्या की जगमगाती छटा श्रद्धालुओं और रामभक्तों के मन में भक्ति, उल्लास और गौरव का भाव जागृत कर रही है। रामनगरी का यह अलौकिक दृश्य मानो त्रेतायुग की उस ऐतिहासिक बेला की याद दिला रहा है, जब प्रभु श्रीराम के अयोध्या आगमन पर पूरी अवधपुरी दीपमालाओं से सज उठी थी। आज वही परंपरा नए उत्साह और भव्यता के साथ सनातन संस्कृति की गौरवगाथा को आगे बढ़ा रही है।