📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Sujay2026
धर्म
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर में मांस प्रतिबंध बरकरार रखा
✍️ Livemint
🗓 08 नव. 2026, 03:01 AM
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमनाथ मंदिर में मांसभोजन प्रतिबंध हटाने से इनकार कर दिया, कानूनी और धार्मिक कारणों को बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर में मांसभोजन प्रतिबंध हटाने की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह प्रतिबंध मंदिर की पुरानी परम्पराओं और प्रबंधन की अधिकारिता के अनुरूप है।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि यह प्रतिबंध भक्तों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, पर न्यायाधीशों ने बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों का निर्धारण मंदिर ट्रस्ट के भीतर ही होना चाहिए और बाहरी हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कोर्ट आदेशों ने इसी प्रतिबंध को बरकरार रखा है।
सोमनाथ, जो शिव के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है और हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, ने दशकों से यह मांस प्रतिबंध लागू रखा है। इस निर्णय से मौजूदा स्थिति बनी रहेगी और मंदिर के आंतरिक नियम अपरिवर्तित रहेंगे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में किसी भी चुनौती के लिए संविधानिक प्रावधानों के साथ-साथ राज्य हस्तक्षेप और धार्मिक स्वायत्तता के संतुलन को भी ध्यान में रखना पड़ेगा।
यह फैसला धार्मिक मामलों में न्यायपालिका की सतर्क भूमिका को रेखांकित करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऐसे मुद्दे स्थापित मंदिर प्रबंधन ढांचे के भीतर ही सुलझाए जाने चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि यह प्रतिबंध भक्तों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, पर न्यायाधीशों ने बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों का निर्धारण मंदिर ट्रस्ट के भीतर ही होना चाहिए और बाहरी हस्तक्षेप से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कोर्ट आदेशों ने इसी प्रतिबंध को बरकरार रखा है।
सोमनाथ, जो शिव के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है और हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, ने दशकों से यह मांस प्रतिबंध लागू रखा है। इस निर्णय से मौजूदा स्थिति बनी रहेगी और मंदिर के आंतरिक नियम अपरिवर्तित रहेंगे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में किसी भी चुनौती के लिए संविधानिक प्रावधानों के साथ-साथ राज्य हस्तक्षेप और धार्मिक स्वायत्तता के संतुलन को भी ध्यान में रखना पड़ेगा।
यह फैसला धार्मिक मामलों में न्यायपालिका की सतर्क भूमिका को रेखांकित करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऐसे मुद्दे स्थापित मंदिर प्रबंधन ढांचे के भीतर ही सुलझाए जाने चाहिए।