📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / TrendSPLEND
नौकरी
राजस्थान हाई कोर्ट ने विधवा की वेतन का 25% सास को देने का आदेश
✍️ timesofindia.indiatimes.com
🗓 23 सित. 2026, 02:46 PM
👁 15
राजस्थान हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि पति की मृत्यु के बाद नौकरी पाने वाली विधवा को अपने वेतन का 25% सास को देना होगा।
राजस्थान में एक विधवा, जो पति की मृत्यु के बाद एक निजी कंपनी में नियुक्त हुई, अपनी सास के आर्थिक समर्थन को लेकर विवाद के बाद राजस्थान हाई कोर्ट में पेश हुई। अदालत ने आदेश दिया कि वह अपनी मासिक आय का 25 प्रतिशत अपनी सास को दे। यह निर्णय सास की निर्भरता और पारिवारिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर दिया गया।
न्यायालय ने हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम और संबंधित वैवाहिक‑कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि विधवा के रोजगार से सास के रख‑रखाव का अधिकार समाप्त नहीं होता।
कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि यह आदेश विधवाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और बुजुर्ग परिवार के सदस्यों की देखभाल के बीच संतुलन स्थापित करने की अदालत की इच्छा को दर्शाता है। इस फैसले पर किसी पक्ष ने सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, और नियोक्ता ने भी कर्मचारी की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं बताया।
यह निर्णय राजस्थान में विधवाओं के रोजगार अधिकार और विस्तारित परिवारों के सामाजिक सुरक्षा जाल पर चल रही चर्चा के बीच आया है। सामाजिक संगठनों ने ऐसे विवादों से बचने के लिए स्पष्ट विधायी दिशा‑निर्देशों की मांग की है।
यह मामला राज्य में रोजगार अधिकार, पारिवारिक कानून और सामाजिक कल्याण के जटिल संबंध को उजागर करता है, और जब विधवा कार्यबल में लौटती है तो अदालतें पारिवारिक वित्तीय दायित्वों को कैसे संभालें, इसका एक उदाहरण स्थापित करता है।
न्यायालय ने हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम और संबंधित वैवाहिक‑कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि विधवा के रोजगार से सास के रख‑रखाव का अधिकार समाप्त नहीं होता।
कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि यह आदेश विधवाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और बुजुर्ग परिवार के सदस्यों की देखभाल के बीच संतुलन स्थापित करने की अदालत की इच्छा को दर्शाता है। इस फैसले पर किसी पक्ष ने सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, और नियोक्ता ने भी कर्मचारी की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं बताया।
यह निर्णय राजस्थान में विधवाओं के रोजगार अधिकार और विस्तारित परिवारों के सामाजिक सुरक्षा जाल पर चल रही चर्चा के बीच आया है। सामाजिक संगठनों ने ऐसे विवादों से बचने के लिए स्पष्ट विधायी दिशा‑निर्देशों की मांग की है।
यह मामला राज्य में रोजगार अधिकार, पारिवारिक कानून और सामाजिक कल्याण के जटिल संबंध को उजागर करता है, और जब विधवा कार्यबल में लौटती है तो अदालतें पारिवारिक वित्तीय दायित्वों को कैसे संभालें, इसका एक उदाहरण स्थापित करता है।