पहाड़ों के किसान का दर्द
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पहाड़ों में किसान की मेहनत पर इस बार बंदरों, जंगली सूअरों और बारिश ने तीनों तरफ से कहर बरपाया। जो फसल और चारा-पत्ती बची थी, उसे भी बारिश ने खराब कर दिया—किसान की मेहनत और उम्मीद दोनों पर भारी चोट पड़ी। 🌧️🌾🏔️
पहाड़ों में खेती करना कभी आसान नहीं रहा, लेकिन इस बार हालात कुछ ज्यादा ही मुश्किल हो गए हैं। किसान ने बड़ी मेहनत और उम्मीद के साथ खेतों में फसल बोई थी। दिन-रात मेहनत करके खेत तैयार किए, बीज डाले और अपनी फसल को अपने बच्चों की तरह संभाला। मगर जब फसल धीरे-धीरे तैयार होने लगी तो पहले बंदरों ने खेतों का रुख किया और काफी नुकसान कर दिया। उसके बाद जंगली सूअरों ने खेतों को उजाड़ दिया। कहीं मक्की की फसल बची नहीं, कहीं धान को नुकसान हुआ, तो कहीं दूसरी फसलें बर्बाद हो गईं। किसान ने फिर भी हिम्मत नहीं छोड़ी और जो थोड़ा बहुत बचा, उसे समेटने की उम्मीद लगाए बैठा रहा। लेकिन कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था। इस बार लगातार हुई बारिश ने बची-खुची फसल और चारा-पत्ती को भी बुरी तरह प्रभावित कर दिया। खेतों में पानी और नमी के कारण कई जगह फसल सड़ गई और पशुओं के लिए जुटाया गया चारा भी खराब हो गया। पहाड़ का किसान वैसे ही सीमित साधनों में खेती करता है, ऊपर से बंदर, सूअर और मौसम की मार उसकी कमर तोड़ देती है। खेतों में उसकी मेहनत दिखाई देती है, लेकिन उस मेहनत की कीमत बहुत कम लोग समझ पाते हैं। एक किसान के लिए फसल सिर्फ अनाज नहीं होती, उसमें पूरे परिवार की उम्मीद, मेहनत और आने वाले महीनों का सहारा जुड़ा होता है। जब खेत उजड़ता है तो सिर्फ फसल नहीं जाती, किसान का हौसला भी टूटता है। पहाड़ों की खेती आज सच में बहुत कठिन दौर से गुजर रही है। जंगल और खेत के बीच रहने वाला किसान हर दिन नई चुनौती का सामना कर रहा है। कभी बंदरों का आतंक, कभी जंगली सूअरों का नुकसान और अब मौसम की बेरुखी—आखिर किसान जाए तो जाए कहाँ? फिर भी पहाड़ का किसान हार मानने वालों में से नहीं है। वह आज भी उम्मीद के साथ अगली फसल की तैयारी करेगा, क्योंकि खेती उसके लिए सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, उसके गाँव और उसकी जिंदगी से जुड़ी हुई है। बस जरूरत है कि पहाड़ के किसान की इस पीड़ा को समझा जाए और उसकी मेहनत को उसका हक मिले। 🌧️🌾🏔️