📷 चित्र स्रोत: Flickr (CC)
राजनीति
अलवर: टीकाराम जूली ने तिजारा चुनाव में मुख्यमंत्री की सीमा पार करने का आरोप
✍️ Amar Ujala · Alwar
🗓 22 सित. 2026, 07:45 PM
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विपक्ष नेता टीकाराम जूली ने कहा, तिजारा स्थानीय निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री ने पुलिस, जीएसटी अधिकारी और तहसीलदार का उपयोग कर सीमाएँ पार कीं, जनादेश नहीं हटाया जा सकता।
अलवर जिले के तिजारा में हुए स्थानीय निकाय चुनाव के बाद राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। विपक्षी विधायक टीकाराम जूली ने सार्वजनिक तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री पर चुनावी परिणाम को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सभी सीमाएँ पार करने का आरोप लगाया।
जूली ने कहा कि मुख्यमंत्री ने पुलिस, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, जीएसटी आयुक्त और तहसीलदार तक को चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जबकि पुलिस के माध्यम से किसी चुने हुए पार्षद को रोका जा सकता है, मतदाताओं का जनादेश नहीं मिटाया जा सकता।
इन आरोपों ने राजस्थान में ruling और opposition दलों के बीच तनाव बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली है, जबकि विपक्ष ने चुनाव आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज करने की बात कही है।
यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं तो चुनाव के दौरान प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग की जांच शुरू हो सकती है, जो हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय रहा है।
यह घटना राज्य के स्थानीय शासन में राजनीतिक शक्ति और चुनावी पारदर्शिता के बीच नाज़ुक संतुलन को उजागर करती है।
जूली ने कहा कि मुख्यमंत्री ने पुलिस, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, जीएसटी आयुक्त और तहसीलदार तक को चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जबकि पुलिस के माध्यम से किसी चुने हुए पार्षद को रोका जा सकता है, मतदाताओं का जनादेश नहीं मिटाया जा सकता।
इन आरोपों ने राजस्थान में ruling और opposition दलों के बीच तनाव बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली है, जबकि विपक्ष ने चुनाव आयोग में औपचारिक शिकायत दर्ज करने की बात कही है।
यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं तो चुनाव के दौरान प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग की जांच शुरू हो सकती है, जो हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय रहा है।
यह घटना राज्य के स्थानीय शासन में राजनीतिक शक्ति और चुनावी पारदर्शिता के बीच नाज़ुक संतुलन को उजागर करती है।