📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Bollywood Hungama
टेक्नोलॉजी
ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए नई तकनीक अपनाई, कहे काउशिक
✍️ Pioneer Edge
🗓 31 अग. 2026, 01:29 AM
👁 11
काउशिक ने बताया कि उन्नत तकनीक से ग्लेशियल झीलों की स्थिरता की निगरानी की जाएगी, जिससे चेतावनी प्रणाली सुदृढ़ होगी।
प्रसिद्ध शोधकर्ता काउशिक ने बताया कि हिमालय में ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए उन्नत रिमोट‑सेंसिंग और रीयल‑टाइम डेटा एनालिटिक्स उपकरणों का उपयोग किया जाएगा। यह तकनीक उपग्रह चित्र, ड्रोन और एआई‑आधारित मॉडल को मिलाकर जलाशय के आयतन और बर्फ़ीले प्रवाह में बदलाव का पता लगाती है।
पायनियर एज के सहयोग से शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट अधिकारियों को संभावित जल‑भस्म के बारे में शीघ्र चेतावनी देने का लक्ष्य रखता है, जिससे नीचे बसे गाँवों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। निरंतर डेटा प्रवाह से प्रतिक्रिया समय घटेगा और आपदा‑प्रबंधन योजना मजबूत होगी।
राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियों सहित कई हितधारकों ने इस कदम का स्वागत किया है, यह मानते हुए कि पहले चेतावनी से जान‑माल की रक्षा संभव है। इस वर्ष सर्दियों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में पायलट परीक्षण शुरू होगा, और दो साल में पूरी कवरेज की योजना है।
विशेषज्ञ यह कहते हैं कि केवल तकनीक से जोखिम समाप्त नहीं होगा; निकासी प्रोटोकॉल और जनजागरूकता भी आवश्यक है। फिर भी, यह कदम जलवायु‑प्रेरित आपदाओं से निपटने में आधुनिक विज्ञान के उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति दर्शाता है।
यह पहल भारत की ग्लेशियर निगरानी नीति में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बदलाव को दर्शाती है और जलवायु लचीलापन के प्रति देश की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है।
पायनियर एज के सहयोग से शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट अधिकारियों को संभावित जल‑भस्म के बारे में शीघ्र चेतावनी देने का लक्ष्य रखता है, जिससे नीचे बसे गाँवों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। निरंतर डेटा प्रवाह से प्रतिक्रिया समय घटेगा और आपदा‑प्रबंधन योजना मजबूत होगी।
राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियों सहित कई हितधारकों ने इस कदम का स्वागत किया है, यह मानते हुए कि पहले चेतावनी से जान‑माल की रक्षा संभव है। इस वर्ष सर्दियों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में पायलट परीक्षण शुरू होगा, और दो साल में पूरी कवरेज की योजना है।
विशेषज्ञ यह कहते हैं कि केवल तकनीक से जोखिम समाप्त नहीं होगा; निकासी प्रोटोकॉल और जनजागरूकता भी आवश्यक है। फिर भी, यह कदम जलवायु‑प्रेरित आपदाओं से निपटने में आधुनिक विज्ञान के उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति दर्शाता है।
यह पहल भारत की ग्लेशियर निगरानी नीति में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बदलाव को दर्शाती है और जलवायु लचीलापन के प्रति देश की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है।