📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Gyanendra_Singh_Chau…
राजनीति
MP हाईकोर्ट ने केंद्र‑राज्य को केन‑बेतवा लिंक पर्यावरण रिपोर्ट पर दो हफ्ते में जवाब देने का आदेश
✍️ Amar Ujala · Jabalpur
🗓 13 अक्टू. 2026, 09:46 PM
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को केन‑बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन पर दो हफ्ते के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया, साथ ही सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट और सरकारी कार्यवाही की जानकारी मांगी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को केन‑बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों पर दो हफ्ते के भीतर लिखित जवाब देने का आदेश दिया है। अदालत ने विशेष रूप से सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) द्वारा तैयार की गई पर्यावरणीय मूल्यांकन रिपोर्ट तथा अधिकारियों द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदमों की जानकारी मांगी है।
केन‑बेतवा लिंक एक बड़े पैमाने का अंतर‑नदी जल स्थानांतरण योजना है, जिसका उद्देश्य केन नदी से पानी को बेतवा जलाशय में प्रवाहित कर राज्य के कई जिलों में जल की कमी दूर करना है। समर्थकों ने इसे सिंचाई और पेयजल के लाभ के रूप में प्रस्तुत किया है, जबकि पर्यावरण संगठनों ने वन कटाव, वन्यजीवों के विस्थापन और नदी पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव जैसी चिंताएँ उठाई हैं।
सीईसी की रिपोर्ट और सरकार की कार्यवाही की मांग करके न्यायालय यह जांचना चाहता है कि क्या यह परियोजना कानूनी पर्यावरणीय मानदंडों का पालन करती है। यह आदेश बड़े बुनियादी ढाँचे के कार्यान्वयन से पहले कठोर जांच की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
दो हफ्ते की समय सीमा के कारण संबंधित मंत्रालयों को मांगी गई दस्तावेज़ीकरण तैयार करने में तेज़ी करनी होगी, जिससे परियोजना की आगे की स्वीकृति या संशोधन प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
केन‑बेतवा लिंक एक बड़े पैमाने का अंतर‑नदी जल स्थानांतरण योजना है, जिसका उद्देश्य केन नदी से पानी को बेतवा जलाशय में प्रवाहित कर राज्य के कई जिलों में जल की कमी दूर करना है। समर्थकों ने इसे सिंचाई और पेयजल के लाभ के रूप में प्रस्तुत किया है, जबकि पर्यावरण संगठनों ने वन कटाव, वन्यजीवों के विस्थापन और नदी पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव जैसी चिंताएँ उठाई हैं।
सीईसी की रिपोर्ट और सरकार की कार्यवाही की मांग करके न्यायालय यह जांचना चाहता है कि क्या यह परियोजना कानूनी पर्यावरणीय मानदंडों का पालन करती है। यह आदेश बड़े बुनियादी ढाँचे के कार्यान्वयन से पहले कठोर जांच की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
दो हफ्ते की समय सीमा के कारण संबंधित मंत्रालयों को मांगी गई दस्तावेज़ीकरण तैयार करने में तेज़ी करनी होगी, जिससे परियोजना की आगे की स्वीकृति या संशोधन प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।