📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Dev0745
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झारखंड का पारंपरिक वाद्य मंडर को जीआई टैग मिला
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🗓 29 सित. 2026, 04:03 PM
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झारखंड का पारंपरिक वाद्य मंडर को जीआई टैग मिला, जिससे इसकी सांस्कृतिक विरासत को मान्यता मिली।
जीआई टैग के साथ झारखंड के पारंपरिक वाद्य मंडर को मान्यता मिली है, जो राज्य की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह टैग नाम की सुरक्षा करता है और सुनिश्चित करता है कि केवल पारंपरिक तरीकों से बने वाद्य ही मंडर के नाम से बेचे जाएँ।
मंडर, एक दो तरफा ढोल, झारखंड के जनजातीय समुदायों के त्योहारों और अनुष्ठानों में प्रमुख भूमिका निभाता है। इसकी विशिष्ट ध्वनि लकड़ी के फ्रेम और पशु चमड़े की तख़्तों से उत्पन्न होती है, और इसे अक्सर ढोल और हार्मोनियम के साथ बजाया जाता है।
कलाकारों और संगीतकारों ने इस मान्यता का स्वागत किया, क्योंकि इससे स्थानीय शिल्पकारों की मांग बढ़ेगी और बाजार में बेहतर पहुँच मिलेगी। जीआई टैग पारंपरिक ज्ञान को नक़ल से बचाता है और सतत आजीविका को बढ़ावा देता है।
झारखंड राज्य सांस्कृतिक मामलों के विभाग ने इस निर्णय की घोषणा की, जिसमें वाद्य के ऐतिहासिक महत्व और भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदाओं को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।
मंडर, एक दो तरफा ढोल, झारखंड के जनजातीय समुदायों के त्योहारों और अनुष्ठानों में प्रमुख भूमिका निभाता है। इसकी विशिष्ट ध्वनि लकड़ी के फ्रेम और पशु चमड़े की तख़्तों से उत्पन्न होती है, और इसे अक्सर ढोल और हार्मोनियम के साथ बजाया जाता है।
कलाकारों और संगीतकारों ने इस मान्यता का स्वागत किया, क्योंकि इससे स्थानीय शिल्पकारों की मांग बढ़ेगी और बाजार में बेहतर पहुँच मिलेगी। जीआई टैग पारंपरिक ज्ञान को नक़ल से बचाता है और सतत आजीविका को बढ़ावा देता है।
झारखंड राज्य सांस्कृतिक मामलों के विभाग ने इस निर्णय की घोषणा की, जिसमें वाद्य के ऐतिहासिक महत्व और भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदाओं को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।