📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Indian Navy
सरकारी योजना
मेक इन इंडिया: 12 वर्ष, 12 मापदंडों पर कम प्रभाव
✍️ The Hindu
🗓 25 सित. 2026, 11:19 AM
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मेक इन इंडिया पहल के 12 प्रमुख मापदंडों पर हालिया विश्लेषण से पता चलता है कि जीडीपी वृद्धि, रोजगार और वैश्विक बाजार हिस्सेदारी में केवल मामूली सुधार हुआ है।
एक नई अध्ययन ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के पहले बारह वर्षों का मूल्यांकन किया है और पाया है कि इस पहल का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव मामूली और असमान रहा है। इस रिपोर्ट ने बारह अलग-अलग मापदंडों का परीक्षण किया, जिसमें निवेश प्रवाह, विनिर्माण उत्पादन, रोजगार सृजन और निर्यात हिस्सेदारी शामिल हैं।
परिणामों से पता चलता है कि कुछ सकारात्मक रुझान हैं, लेकिन जीडीपी वृद्धि, नौकरी सृजन और वैश्विक विनिर्माण बाजार में भारत का हिस्सा सीमित है। कई मापदंडों में प्रगति असंगत रही, जहाँ एक क्षेत्र में लाभ अन्य क्षेत्र में स्थिरता या गिरावट से संतुलित हो गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि चुने गए मापदंड कार्यक्रम के प्रदर्शन का व्यापक दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जो सफलताओं और कमियों दोनों को उजागर करते हैं। अध्ययन से पता चलता है कि कार्यक्रम के डिजाइन और कार्यान्वयन में समायोजन की आवश्यकता है ताकि अधिक सुसंगत परिणाम मिल सकें।
रिपोर्ट नीति उपायों का पुनर्मूल्यांकन, खासकर उच्च‑मूल्य वाले क्षेत्रों में निजी निवेश के लिए मजबूत प्रोत्साहन और स्पष्ट लक्ष्यों के साथ मजबूत निगरानी की मांग करती है। इससे मेक इन इंडिया के भविष्य के चरणों को वास्तविक लाभ मिल सकेगा।
कुल मिलाकर, यह विश्लेषण दर्शाता है कि मेक इन इंडिया ने भारत की विनिर्माण प्रोफ़ाइल को ऊँचा किया है, परंतु वृद्धि, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर इसका प्रभाव अपेक्षा से कम रहा है।
परिणामों से पता चलता है कि कुछ सकारात्मक रुझान हैं, लेकिन जीडीपी वृद्धि, नौकरी सृजन और वैश्विक विनिर्माण बाजार में भारत का हिस्सा सीमित है। कई मापदंडों में प्रगति असंगत रही, जहाँ एक क्षेत्र में लाभ अन्य क्षेत्र में स्थिरता या गिरावट से संतुलित हो गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि चुने गए मापदंड कार्यक्रम के प्रदर्शन का व्यापक दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जो सफलताओं और कमियों दोनों को उजागर करते हैं। अध्ययन से पता चलता है कि कार्यक्रम के डिजाइन और कार्यान्वयन में समायोजन की आवश्यकता है ताकि अधिक सुसंगत परिणाम मिल सकें।
रिपोर्ट नीति उपायों का पुनर्मूल्यांकन, खासकर उच्च‑मूल्य वाले क्षेत्रों में निजी निवेश के लिए मजबूत प्रोत्साहन और स्पष्ट लक्ष्यों के साथ मजबूत निगरानी की मांग करती है। इससे मेक इन इंडिया के भविष्य के चरणों को वास्तविक लाभ मिल सकेगा।
कुल मिलाकर, यह विश्लेषण दर्शाता है कि मेक इन इंडिया ने भारत की विनिर्माण प्रोफ़ाइल को ऊँचा किया है, परंतु वृद्धि, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर इसका प्रभाव अपेक्षा से कम रहा है।