📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Gyanendra_Singh_Chau…
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एमपी हाईकोर्ट ने नानी को नाती के भरण‑पोषण का अधिकार दिया
✍️ Amar Ujala · Jabalpur
🗓 23 अक्टू. 2026, 10:31 PM
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जबलपुर में एमपी हाईकोर्ट ने कहा कि नानी, चाहे कानूनी अभिभावक न हो, नाती के भरण‑पोषण के लिए दावा कर सकती है।
जबलपुर में स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण‑पोषण का अधिकार केवल इस कारण से नहीं रोका जा सकता कि देखभाल करने वाली नानी कानूनी अभिभावक के रूप में नियुक्त नहीं है। इस मामले में नानी ने अपनी नाती के लिए आर्थिक सहायता का अनुरोध किया, क्योंकि वह उसकी मुख्य देखभालकर्ता थी।
कोर्ट ने कहा कि कानून का मूल उद्देश्य बच्चे की भलाई है, और अभिभावकता की औपचारिकताओं को रखरखाव के दावे में बाधा नहीं बनना चाहिए। इसलिए फैमिली कोर्ट के उस निर्णय को निरस्त कर दिया गया, जिसमें नानी के दावे को खारिज किया गया था।
कानूनी विशेषज्ञों ने बताया कि यह फैसला यह सिद्धांत मजबूत करता है कि रखरखाव की जिम्मेदारी बच्चे के सर्वोत्तम हित पर आधारित है, न कि केवल कानूनी संरचना पर। यह निर्णय राज्य के सभी फैमिली कोर्टों के लिए मार्गदर्शक होगा और उन मामलों की पुनः समीक्षा को प्रेरित करेगा जहाँ दादा‑दादी मुख्य देखभालकर्ता हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायपालिका का कर्तव्य है कि कमजोर बच्चों को आवश्यक आर्थिक समर्थन मिले, चाहे देखभाल करने वाला कानूनी रूप से अभिभावक न हो। यह आदेश अब मध्य प्रदेश के फैमिली कोर्टों पर बाध्यकारी है।
यह निर्णय भारतीय न्यायिक प्रथा के साथ संगत है, जो बच्चे के कल्याण को प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं से ऊपर रखता है, और भविष्य में रखरखाव व अभिभावकता से संबंधित विधायी सुधारों को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि कानून का मूल उद्देश्य बच्चे की भलाई है, और अभिभावकता की औपचारिकताओं को रखरखाव के दावे में बाधा नहीं बनना चाहिए। इसलिए फैमिली कोर्ट के उस निर्णय को निरस्त कर दिया गया, जिसमें नानी के दावे को खारिज किया गया था।
कानूनी विशेषज्ञों ने बताया कि यह फैसला यह सिद्धांत मजबूत करता है कि रखरखाव की जिम्मेदारी बच्चे के सर्वोत्तम हित पर आधारित है, न कि केवल कानूनी संरचना पर। यह निर्णय राज्य के सभी फैमिली कोर्टों के लिए मार्गदर्शक होगा और उन मामलों की पुनः समीक्षा को प्रेरित करेगा जहाँ दादा‑दादी मुख्य देखभालकर्ता हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायपालिका का कर्तव्य है कि कमजोर बच्चों को आवश्यक आर्थिक समर्थन मिले, चाहे देखभाल करने वाला कानूनी रूप से अभिभावक न हो। यह आदेश अब मध्य प्रदेश के फैमिली कोर्टों पर बाध्यकारी है।
यह निर्णय भारतीय न्यायिक प्रथा के साथ संगत है, जो बच्चे के कल्याण को प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं से ऊपर रखता है, और भविष्य में रखरखाव व अभिभावकता से संबंधित विधायी सुधारों को प्रभावित कर सकता है।