📷 चित्र स्रोत: Flickr (CC)
मनोरंजन
लेपचा संगीतकार टुंगबुक और पुमटोंग पुलित ने बताया कैसे सिक्किम के जंगल उनके संगीत को प्रेरित करते हैं
✍️ The Better India
🗓 23 अग. 2026, 06:48 AM
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द बेटर इंडिया ने लेपचा कलाकार टुंगबुक और पुमटोंग पुलित की कहानी प्रस्तुत की, जिसमें सिक्किम के जंगलों का उनके पारम्परिक संगीत पर प्रभाव बताया गया है।
लेपचा संगीत के दो प्रमुख कलाकार, टुंगबुक और पुमटोंग पुलित, ने सिक्किम के जंगलों और अपने संगीत के बीच गहरे संबंध को बताया है। द बेटर इंडिया में प्रकाशित साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि पत्तियों की सरसराहट, धारा की ध्वनि और स्थानीय वन्यजीवों की आवाज़ें उनके रचनाओं में समाहित होती हैं, जिससे संगीत में एक अनोखा स्थानिक भाव उत्पन्न होता है।
इन कलाकारों ने कहा कि घने वन क्षेत्रों में बड़े होते हुए उन्होंने न केवल प्रेरणा प्राप्त की, बल्कि मौखिक परम्पराओं का भंडार भी संजोया। वे अक्सर ऐसे पारम्परिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं जो प्रकृति की लय को प्रतिबिंबित करते हैं, जिससे श्रोताओं को ध्वनि के माध्यम से जंगल का अनुभव होता है।
टुंगबुक और पुमटोंग पुलित का यह प्रयास न केवल लेपचा संगीत की धरोहर को संरक्षित करता है, बल्कि पर्यावरणीय जागरूकता को भी उजागर करता है। उनका संगीत सिक्किम के जंगलों की रक्षा के महत्व को उजागर करता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के कलाकार और श्रोताओं को इस प्राकृतिक विरासत का लाभ मिल सके।
इन कलाकारों ने कहा कि घने वन क्षेत्रों में बड़े होते हुए उन्होंने न केवल प्रेरणा प्राप्त की, बल्कि मौखिक परम्पराओं का भंडार भी संजोया। वे अक्सर ऐसे पारम्परिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं जो प्रकृति की लय को प्रतिबिंबित करते हैं, जिससे श्रोताओं को ध्वनि के माध्यम से जंगल का अनुभव होता है।
टुंगबुक और पुमटोंग पुलित का यह प्रयास न केवल लेपचा संगीत की धरोहर को संरक्षित करता है, बल्कि पर्यावरणीय जागरूकता को भी उजागर करता है। उनका संगीत सिक्किम के जंगलों की रक्षा के महत्व को उजागर करता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के कलाकार और श्रोताओं को इस प्राकृतिक विरासत का लाभ मिल सके।