📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Augustus Binu/ www.dreamsparrow.net/ facebook
मनोरंजन
केरल हाई कोर्ट ने जियोसिनेमा की वेब सीरीज़ 'अनाली' को रोक दिया, कोडाथायी हत्याकांड के आरोप
✍️ Live Law
🗓 21 अग. 2026, 10:38 AM
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केरल हाई कोर्ट ने जियोसिनेमा की नई वेब सीरीज़ ‘अनाली’ के प्रीमियर पर रोक लगा दी, क्योंकि इसे कोडाथायी हत्याकांड से जोड़ा गया है।
केरल हाई कोर्ट ने बुधवार को जियोसिनेमा की आगामी वेब सीरीज़ ‘अनाली’ के प्रीमियर पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश जारी किया। यह आदेश उन याचिकाओं के बाद आया, जिनमें कहा गया कि इस कथा में कोडाथायी हत्याकांड की वास्तविक घटनाओं की बहुत समानता है, जो राज्य में बड़े विवाद का कारण बना था।
स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म के वकीलों ने कहा कि यह सीरीज़ पूरी तरह काल्पनिक है और इसमें किसी भी वास्तविक व्यक्ति का उल्लेख नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने फिर भी तर्क दिया कि पात्रों के नाम और घटनाओं की रूपरेखा वास्तविक पीड़ितों और आरोपी के साथ बहुत मिलती-जुलती है, जिससे निजता का उल्लंघन और सार्वजनिक भावनाओं में उथल‑पुथल हो सकती है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को दस दिनों के भीतर विस्तृत तर्क प्रस्तुत करने और यह रिपोर्ट देने का निर्देश दिया कि क्या एपीसोड को प्रसारित करने से पहले स्क्रिप्ट में कोई परिवर्तन आवश्यक है। तब तक जियोसिनेमा को सामग्री को ऑफ़लाइन रखना होगा।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डिजिटल कंटेंट पर बढ़ते नियामक दबाव को दर्शाता है, जहाँ हालिया अपराधों पर आधारित रचनात्मक अभिव्यक्ति और पीड़ित परिवारों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना न्यायालयों की चुनौती बन गया है।
स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म के वकीलों ने कहा कि यह सीरीज़ पूरी तरह काल्पनिक है और इसमें किसी भी वास्तविक व्यक्ति का उल्लेख नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने फिर भी तर्क दिया कि पात्रों के नाम और घटनाओं की रूपरेखा वास्तविक पीड़ितों और आरोपी के साथ बहुत मिलती-जुलती है, जिससे निजता का उल्लंघन और सार्वजनिक भावनाओं में उथल‑पुथल हो सकती है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को दस दिनों के भीतर विस्तृत तर्क प्रस्तुत करने और यह रिपोर्ट देने का निर्देश दिया कि क्या एपीसोड को प्रसारित करने से पहले स्क्रिप्ट में कोई परिवर्तन आवश्यक है। तब तक जियोसिनेमा को सामग्री को ऑफ़लाइन रखना होगा।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डिजिटल कंटेंट पर बढ़ते नियामक दबाव को दर्शाता है, जहाँ हालिया अपराधों पर आधारित रचनात्मक अभिव्यक्ति और पीड़ित परिवारों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना न्यायालयों की चुनौती बन गया है।