📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Muhammad Mahdi Karim/ Augustus Binu
बिज़नेस
कर्नाटक हाई कोर्ट ने समान‑लिंग जोड़ों के उपहार कर छूट पर सुनवाई
✍️ Mangalore Today
🗓 24 सित. 2026, 02:17 PM
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कर्नाटक हाई कोर्ट में समान‑लिंग जोड़े ने उपहार कर छूट के लिए अपनी याचिका दायर की है, जिसमें साझेदारों के बीच दिए‑गए उपहारों की कर छूट पर सवाल उठाया गया है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक समान‑लिंग जोड़े द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई शुरू कर ली है, जिसमें वे साझेदारों के बीच दिए‑गए उपहारों पर आयकर छूट की स्पष्टता चाहते हैं। याचिकाकर्ता दावा करते हैं कि आयकर अधिनियम की धारा 56(2) के तहत पति‑पत्नी को मिलने वाले कर‑मुक्त उपहारों की व्यवस्था समान‑लिंग रिश्तों पर भी लागू होनी चाहिए।
वर्तमान में, आयकर नियम में "रिश्तेदार" की परिभाषा में केवल वैवाहिक संबंध और रक्त संबंध शामिल हैं, जबकि गैर‑रिश्तेदारों से प्राप्त उपहारों पर निर्धारित सीमा से अधिक होने पर कर लगता है। याचिका इस शब्द को विस्तारित कर समान‑लिंग साझेदारों को भी कर‑मुक्त उपहारों का अधिकार देने की मांग करती है।
विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला भारत में समान‑लिंग साझेदारियों के कर‑स्थिति को निर्धारित करने वाला पहला महत्वपूर्ण निर्णय हो सकता है। कोर्ट ने अगले सप्ताह सुनवाई निर्धारित की है और कर विभाग तथा याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सुनने के बाद अपना निर्णय देगा।
यदि कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह LGBTQ+ समुदाय के लिए वित्तीय समानता की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, जिससे कर नियमों में संशोधन और अन्य राज्यों में समान मामलों में प्रभाव पड़ने की संभावना है।
वर्तमान में, आयकर नियम में "रिश्तेदार" की परिभाषा में केवल वैवाहिक संबंध और रक्त संबंध शामिल हैं, जबकि गैर‑रिश्तेदारों से प्राप्त उपहारों पर निर्धारित सीमा से अधिक होने पर कर लगता है। याचिका इस शब्द को विस्तारित कर समान‑लिंग साझेदारों को भी कर‑मुक्त उपहारों का अधिकार देने की मांग करती है।
विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला भारत में समान‑लिंग साझेदारियों के कर‑स्थिति को निर्धारित करने वाला पहला महत्वपूर्ण निर्णय हो सकता है। कोर्ट ने अगले सप्ताह सुनवाई निर्धारित की है और कर विभाग तथा याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सुनने के बाद अपना निर्णय देगा।
यदि कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो यह LGBTQ+ समुदाय के लिए वित्तीय समानता की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, जिससे कर नियमों में संशोधन और अन्य राज्यों में समान मामलों में प्रभाव पड़ने की संभावना है।