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झारखंड हाई कोर्ट ने बंध्यत्व को तलाक का कारण मानने वाले याचिकाकर्ता की याचिका खारिज की
✍️ The Indian Express
🗓 28 अग. 2026, 05:37 AM
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झारखंड हाई कोर्ट ने पति की बंध्यत्व को तलाक का कारण मानने वाली याचिका खारिज कर दी, यह कहा कि बंध्यत्व वैध कारण नहीं है।
झारखंड हाई कोर्ट ने सोमवार को बंध्यत्व को एकमात्र कारण मानते हुए पति द्वारा दायर तलाक की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दंपति के संतान न हो पाने से वैवाहिक बंधन को समाप्त करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी की बंध्यत्व को वैवाहिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया, पर न्यायालय ने कहा कि भारतीय वैवाहिक कानून में केवल चिकित्सीय या जैविक कारणों से विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता।
न्यायाधीशों ने संविधान में निहित समानता और भेदभाव न करने के सिद्धांतों को दोहराया, और कहा कि बंध्यत्व को कारण बना कर तलाक की अनुमति देना सामाजिक रूप से खतरनाक मिसाल स्थापित कर सकता है। इस प्रकार, संतान न होने की समस्या को परामर्श या दत्तक ग्रहण के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, न कि वैवाहिक बंधन को तोड़कर।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुरूप है, जिसमें बंध्यत्व को तलाक या वैवाहिक निरस्तीकरण का आधार नहीं माना गया है। यह मामला प्रजनन संबंधी चुनौतियों के बावजूद वैवाहिक स्थिरता की रक्षा पर न्यायपालिका के रुख को उजागर करता है।
याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी की बंध्यत्व को वैवाहिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया, पर न्यायालय ने कहा कि भारतीय वैवाहिक कानून में केवल चिकित्सीय या जैविक कारणों से विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता।
न्यायाधीशों ने संविधान में निहित समानता और भेदभाव न करने के सिद्धांतों को दोहराया, और कहा कि बंध्यत्व को कारण बना कर तलाक की अनुमति देना सामाजिक रूप से खतरनाक मिसाल स्थापित कर सकता है। इस प्रकार, संतान न होने की समस्या को परामर्श या दत्तक ग्रहण के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, न कि वैवाहिक बंधन को तोड़कर।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुरूप है, जिसमें बंध्यत्व को तलाक या वैवाहिक निरस्तीकरण का आधार नहीं माना गया है। यह मामला प्रजनन संबंधी चुनौतियों के बावजूद वैवाहिक स्थिरता की रक्षा पर न्यायपालिका के रुख को उजागर करता है।