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13 अक्टू. 2026•
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जैनुद्दीनपुर में जमीन के बैनामों को लेकर उठे गंभीर सवाल! एक ही जमीन की दोबारा रजिस्ट्री का आरोप, घूर-गड्ढे की भूमि पर कब्जे की भी चर्चा*

जैनुद्दीनपुर में जमीन के बैनामों को लेकर उठे गंभीर सवाल! एक ही जमीन की दोबारा रजिस्ट्री का आरोप, घूर-गड्ढे की भूमि पर कब्जे की भी चर्चा*

✍️ रिपोर्टर: Mohammad Rizwan 🗓 13 अक्टू. 2026, 01:54 PM 👁 16
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जैनुद्दीनपुर में जमीन के बैनामों को लेकर उठे गंभीर सवाल! एक ही जमीन की दोबारा रजिस्ट्री का आरोप, घूर-गड्ढे की भूमि पर कब्जे की भी चर्चा*

*जैनुद्दीनपुर में जमीन के बैनामों को लेकर उठे गंभीर सवाल! एक ही जमीन की दोबारा रजिस्ट्री का आरोप, घूर-गड्ढे की भूमि पर कब्जे की भी चर्चा*

टांडा में जमीनों के अभिलेख, नक्शे और बैनामों की निष्पक्ष जांच की मांग; सरकारी व सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर कब्जे की शिकायतें सही या गलत, जांच के बाद ही खुलेगा पूरा मामला


*अम्बेडकरनगर। जमीन के कारोबार में पारदर्शिता और राजस्व अभिलेखों की शुद्धता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं, लेकिन जब एक ही जमीन के बार-बार बैनामा होने, नक्शे के आधार पर जमीन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट न होने और ग्राम सभा की सार्वजनिक उपयोग वाली भूमि पर कब्जे जैसे आरोप सामने आने लगें*, तो मामला केवल निजी जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रहता। यह राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली, भूमि अभिलेखों की विश्वसनीयता और सरकारी जमीन की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।

*ऐसा ही मामला जनपद अम्बेडकरनगर की टांडा तहसील क्षेत्र की ग्राम सभा जैनुद्दीनपुर से चर्चा में आया है। यहां जमीनों के बैनामों, नक्शे और घूर-गड्ढे की भूमि को लेकर तरह-तरह की* चर्चाएं और आरोप सामने आ रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन चर्चाओं के पीछे वास्तविकता क्या है? क्या जमीनों के बैनामे नियमानुसार हुए हैं, क्या राजस्व अभिलेख मौके की स्थिति से मेल खाते हैं और क्या ग्राम सभा की सार्वजनिक भूमि सुरक्षित है? इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।

*एक जमीन का पूरा बैनामा होने के बाद दोबारा बैनामा कैसे*?

इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप एक जमीन के संपूर्ण बैनामे के बाद उसी जमीन को दोबारा *अन्य लोगों के नाम बैनामा किए जाने को लेकर लगाया जा रहा है*। यदि अभिलेखों की जांच में ऐसा कोई मामला सही पाया जाता है, तो यह बेहद गंभीर विषय होगा। इससे न केवल खरीदारों के बीच स्वामित्व को लेकर विवाद पैदा हो सकता है, बल्कि जमीन की वास्तविक स्थिति और राजस्व रिकॉर्ड की शुद्धता पर भी सवाल खड़े होंगे।

आखिर किसी जमीन का पहले ही पूरा बैनामा हो चुका हो, तो उसके बाद उसी भूमि के हिस्से या संपूर्ण क्षेत्र का दोबारा बैनामा किस आधार पर हुआ? क्या दोनों बैनामों में दर्शाई गई जमीन का गाटा नंबर, रकबा, चौहद्दी और नक्शा एक ही है? क्या पहले बैनामे के बाद राजस्व अभिलेखों में आवश्यक बदलाव किए गए थे? क्या दूसरे बैनामे के समय पहले से दर्ज स्वामित्व की जांच की गई?

ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब कागजी दावों या गांव में चल रही चर्चाओं से नहीं, बल्कि संबंधित बैनामा दस्तावेजों, खतौनी, खसरा, नक्शे और अन्य राजस्व अभिलेखों के मिलान से ही मिल सकता है।

यदि एक ही जमीन पर अलग-अलग लोगों के स्वामित्व के दावे सामने आते हैं, तो प्रशासन को पूरे मामले की गहराई से जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष खरीदार को आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े और जमीन से जुड़े विवाद का समय रहते समाधान हो सके।

लेखपाल के नक्शे पर सवाल, जमीन की वास्तविक स्थिति का हो मिलान

जमीन के बैनामे में भूमि की सही पहचान बेहद महत्वपूर्ण होती है। गाटा संख्या, रकबा, चौहद्दी, राजस्व नक्शा और मौके पर मौजूद जमीन की स्थिति का आपस में मेल खाना आवश्यक है। ग्राम सभा जैनुद्दीनपुर को लेकर सामने आ रहे आरोपों में राजस्व नक्शे की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

आरोप है कि कुछ मामलों में जमीन की वास्तविक स्थिति और बैनामे में दर्शाई गई भूमि के स्थान को लेकर संदेह है। यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि संबंधित लेखपाल द्वारा तैयार या उपलब्ध कराए गए नक्शे में भूमि की स्थिति किस आधार पर दर्शाई गई।

हालांकि, अभी यह प्रमाणित नहीं है कि किसी लेखपाल ने जानबूझकर गलत नक्शा तैयार किया या किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाया। इसलिए आवश्यक है कि संबंधित नक्शों और अभिलेखों की जांच किसी सक्षम अधिकारी की निगरानी में कराई जाए।

प्रशासन यह स्पष्ट करे कि बैनामों में दर्ज भूमि की पहचान कैसे निर्धारित की गई, नक्शे में उसका स्थान क्या है और मौके पर वास्तविक कब्जा किसका है। यदि दस्तावेजों और भौतिक स्थिति में अंतर मिलता है, तो उसकी वजह भी सामने लाई जानी चाहिए।

*घूर-गड्ढे की जमीन पर कब्जे का आरोप, सरकारी भूमि की सुरक्षा पर सवाल*

इस मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ग्राम सभा की घूर-गड्ढे की भूमि को लेकर है। ग्रामीण क्षेत्र में ऐसी भूमि का उपयोग गांव की आवश्यकताओं के लिए निर्धारित हो सकता है और उसका संरक्षण राजस्व प्रशासन की जिम्मेदारी के अंतर्गत आता है। जैनुद्दीनपुर में घूर-गड्ढे की जमीन पर कब्जे की बात भी उठाई जा रही है।

*यदि ग्राम सभा की ऐसी भूमि पर अवैध कब्जा हुआ है, तो यह जांच का विषय है कि कब्जा कब और कैसे हुआ, भूमि का राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है तथा संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं।*

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी और सार्वजनिक उपयोग की भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने पर जोर दिया जाता है, तो ग्राम सभा की भूमि की वास्तविक स्थिति का सत्यापन क्यों न कराया जाए? यदि कहीं अतिक्रमण है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कब्जे का आरोप गलत है, तो अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

*"यहां किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले भूमि की श्रेणी, राजस्व रिकॉर्ड, कब्जे की स्थिति और संबंधित आदेशों की जांच जरूरी है। लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।"*

364 नंबर के बैनामे को लेकर भी उठ रहे सवाल

ग्राम सभा में हाल ही में गाटा संख्या 364 से संबंधित बैनामा होने की बात भी सामने रखी जा रही है। आरोप लगाने वालों का सवाल है कि बैनामे में दर्ज जमीन वास्तव में किस स्थान पर स्थित है और उसका नक्शे तथा राजस्व अभिलेखों से कितना मेल है।

*इस संबंध में बैनामे की प्रमाणित प्रति, संबंधित गाटा संख्या का नक्शा, खतौनी, खसरा और मौके की पैमाइश का मिलान कराया जाना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि बैनामा करने वाले व्यक्ति के पास संबंधित भूमि के* हस्तांतरण का वैध अधिकार था या नहीं तथा बैनामे में दर्ज रकबा और चौहद्दी वास्तविक भूमि से मेल खाते हैं या नहीं।

यदि बैनामे में दर्शाई गई जमीन की पहचान स्पष्ट नहीं है, तो सक्षम राजस्व अधिकारी द्वारा *नियमानुसार स्थलीय निरीक्षण और पैमाइश कराई जा सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि दस्तावेज में दर्ज भूमि और मौके पर बताई जा रही भूमि एक ही है या नहीं।*

महज आरोप के आधार पर बैनामे को फर्जी या अवैध घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि दस्तावेजों में विसंगति की शिकायत है, तो उसकी जांच कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

*क्या अभिलेखों में गड़बड़ी है या विवाद की वजह कुछ और?*

जैनुद्दीनपुर के इस प्रकरण में सबसे जरूरी है कि सभी संबंधित बैनामों और राजस्व अभिलेखों को एक साथ रखकर जांच की जाए। अलग-अलग दस्तावेजों को अलग-अलग देखने के बजाय यह पता लगाया जाना चाहिए कि जमीन का मूल स्वामित्व किसके पास था, कितनी भूमि का हस्तांतरण हुआ, किस तारीख को बैनामा हुआ और उसके बाद उसी भूमि से संबंधित कोई दूसरा दस्तावेज तो निष्पादित नहीं हुआ।

जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि जमीन के नक्शे में कोई संशोधन हुआ है या नहीं, राजस्व अभिलेखों में दर्ज विवरण और मौके की स्थिति में कोई अंतर है या नहीं तथा घूर-गड्ढे की भूमि की श्रेणी और सीमाएं क्या हैं।

यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो संबंधित साक्ष्यों के आधार पर उसकी जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए। दूसरी ओर, यदि आरोप जांच में गलत साबित होते हैं, तो प्रशासन को तथ्य सार्वजनिक कर भ्रम की स्थिति दूर करनी चाहिए।

*उच्चाधिकारी संज्ञान लें, निष्पक्ष जांच से सामने आए सच्चाई*

ग्राम सभा जैनुद्दीनपुर में जमीनों के बैनामे और सार्वजनिक भूमि को लेकर उठ रहे सवालों पर अब सक्षम अधिकारियों का ध्यान जाना जरूरी है। जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी टांडा और संबंधित राजस्व अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे शिकायतों का परीक्षण कराकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें।

जांच के तहत संबंधित बैनामा दस्तावेजों, गाटा संख्या, रकबे, चौहद्दी, राजस्व नक्शे, खतौनी और मौके पर मौजूद कब्जे का मिलान कराया जाए। घूर-गड्ढे की भूमि की स्थिति भी स्पष्ट की जाए। यदि किसी प्रकार की अनियमितता, गलत अभिलेख, अवैध कब्जा या नियमविरुद्ध कार्रवाई प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

*इस मामले में संबंधित लेखपाल और अन्य राजस्व कर्मियों का पक्ष भी लिया जाना चाहिए, ताकि सभी तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सके।*

*फिलहाल जैनुद्दीनपुर में उठ रहे सवालों का अंतिम जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। यदि आरोपों में सच्चाई है, तो अभिलेखों और मौके की जांच से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए; और यदि आरोप निराधार हैं, तो वह भी प्रमाणों के आधार पर सामने आना चाहिए। आखिर जमीन के स्वामित्व, सरकारी भूमि की सुरक्षा और राजस्व रिकॉर्ड की *विश्वसनीयता से जुड़े सवालों पर पारदर्शिता जरूरी है, ताकि गांव में भ्रम दूर हो और किसी के साथ अन्याय न हो।*
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