📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Unknown authorUnknown author
विज्ञान
अंटार्कटिका में भारतीय वैज्ञानिकों ने बर्फ़ से बनायीं गणेश मूर्ति, की इंडोर विसर्जन
✍️ News18
🗓 25 सित. 2026, 12:04 AM
👁 15
अंटार्कटिका के भारतीय वैज्ञानिकों ने बर्फ़ से गणेश की मूर्ति बनाकर अंदर ही विसर्जन किया, जिससे दूरस्थ स्टेशन में एक अनोखी धार्मिक परम्परा स्थापित हुई।
अंटार्कटिका में तैनात भारतीय वैज्ञानिकों के एक समूह ने हाल ही में बर्फ़ से गणेश जी की एक बड़ी प्रतिमा बनाई, जो भारत में अत्यधिक पूजनीय देवता हैं। बर्फ़ को दबाकर और साधारण उपकरणों से तैयार की गई यह प्रतिमा बेस के बर्फ‑भरे मैदान में स्थापित की गई, जिससे ठंडे परिदृश्य में एक अस्थायी मंदिर का रूप मिला।
प्रतिमा की पूर्ति के बाद, टीम ने स्टेशन के सामुदायिक हॉल में एक छोटे जल‑भरे बर्तन में गणेश की विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की। इस इनडोर विसर्जन ने उन्हें अत्यधिक ठंड और प्राकृतिक जल स्रोतों की अनुपस्थिति में भी पारंपरिक रिवाज निभाने की सुविधा दी।
सहभागियों ने बताया कि यह आयोजन उनके मनोबल को बढ़ाने और दूरस्थ कार्य के दौरान भारतीय सांस्कृतिक जुड़ाव को सुदृढ़ करने का एक तरीका था। भारतीय अंटार्कटिका कार्यक्रम के अधिकारियों ने कहा कि ऐसी सांस्कृतिक गतिविधियाँ लंबे समय तक अलगाव में काम करने वाले कर्मचारियों के बीच सामुदायिक भावना को बनाए रखने में मदद करती हैं।
बर्फ़ के गणेश और उनका इनडोर विसर्जन भारत की अंटार्कटिका में उपस्थिति का एक अनोखा पहलू दर्शाते हैं, जहाँ वैज्ञानिक कार्य के साथ‑साथ राष्ट्रीय अभिमान और सांस्कृतिक पहचान भी जीवित रहती है।
प्रतिमा की पूर्ति के बाद, टीम ने स्टेशन के सामुदायिक हॉल में एक छोटे जल‑भरे बर्तन में गणेश की विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की। इस इनडोर विसर्जन ने उन्हें अत्यधिक ठंड और प्राकृतिक जल स्रोतों की अनुपस्थिति में भी पारंपरिक रिवाज निभाने की सुविधा दी।
सहभागियों ने बताया कि यह आयोजन उनके मनोबल को बढ़ाने और दूरस्थ कार्य के दौरान भारतीय सांस्कृतिक जुड़ाव को सुदृढ़ करने का एक तरीका था। भारतीय अंटार्कटिका कार्यक्रम के अधिकारियों ने कहा कि ऐसी सांस्कृतिक गतिविधियाँ लंबे समय तक अलगाव में काम करने वाले कर्मचारियों के बीच सामुदायिक भावना को बनाए रखने में मदद करती हैं।
बर्फ़ के गणेश और उनका इनडोर विसर्जन भारत की अंटार्कटिका में उपस्थिति का एक अनोखा पहलू दर्शाते हैं, जहाँ वैज्ञानिक कार्य के साथ‑साथ राष्ट्रीय अभिमान और सांस्कृतिक पहचान भी जीवित रहती है।