📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Gyanendrasinghchauha…
नौकरी
ग्वालियर हाईकोर्ट ने कहा OBC क्रीमीलेयर में केवल माता‑पिता की सैलरी नहीं देखी जाएगी
✍️ Amar Ujala · Gwalior
🗓 02 अक्टू. 2026, 09:45 AM
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ग्वालियर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी के बच्चे का OBC क्रीमीलेयर केवल माता‑पिता की आय से तय नहीं होगा, और सेवा नियमों की नई जांच का आदेश दिया।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारी के बच्चे के OBC क्रीमीलेयर निर्धारण के मानदंडों पर स्पष्ट दिशा‑निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि केवल माता‑पिता की सैलरी को ही आधार बनाकर यह स्थिति तय नहीं की जा सकती।
आदेश में यह भी कहा गया कि सेवा पद, कैडर वर्गीकरण और पदोन्नति से जुड़े नियमों को भी साथ‑साथ देखा जाना चाहिए। ये सभी पहलू आरक्षण नीति के नियमानुसार समान रूप से लागू होने के लिए आवश्यक हैं।
इस कारण, निचली अदालतों और प्रशासनिक प्राधिकरणों को सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मौजूदा OBC क्रीमीलेयर मामलों की पुनः जांच करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित व्यापक मानदंडों को लागू किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन कई OBC परिवारों को प्रभावित कर सकता है जो शैक्षणिक प्रवेश और सरकारी नौकरी में आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर प्रमाणपत्र पर निर्भर हैं, जिससे राज्य की नौकरशाही में एक व्यवस्थित पुनरावलोकन की संभावना बनती है।
यह निर्णय आरक्षण मानकों की व्याख्या में न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करता है और यह सुनिश्चित करता है कि पात्रता का आकलन केवल एक वित्तीय मानक तक सीमित न रहे।
आदेश में यह भी कहा गया कि सेवा पद, कैडर वर्गीकरण और पदोन्नति से जुड़े नियमों को भी साथ‑साथ देखा जाना चाहिए। ये सभी पहलू आरक्षण नीति के नियमानुसार समान रूप से लागू होने के लिए आवश्यक हैं।
इस कारण, निचली अदालतों और प्रशासनिक प्राधिकरणों को सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मौजूदा OBC क्रीमीलेयर मामलों की पुनः जांच करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित व्यापक मानदंडों को लागू किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन कई OBC परिवारों को प्रभावित कर सकता है जो शैक्षणिक प्रवेश और सरकारी नौकरी में आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर प्रमाणपत्र पर निर्भर हैं, जिससे राज्य की नौकरशाही में एक व्यवस्थित पुनरावलोकन की संभावना बनती है।
यह निर्णय आरक्षण मानकों की व्याख्या में न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करता है और यह सुनिश्चित करता है कि पात्रता का आकलन केवल एक वित्तीय मानक तक सीमित न रहे।