📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Maulik Kansara
अपराध
गुजरात हाई कोर्ट ने यौन अपराध में DNA रिपोर्ट को विशेषज्ञ गवाही के बिना अस्वीकार किया
✍️ Live Law
🗓 29 सित. 2026, 11:01 PM
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गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध में DNA रिपोर्ट को तभी स्वीकार किया जाएगा जब परीक्षण करने वाले वैज्ञानिक को अदालत में पेश किया जाए।
अहमदाबाद में स्थित गुजरात हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यौन अपराध के मामले में DNA रिपोर्ट को तभी स्वीकार किया जाएगा जब परीक्षण करने वाले फोरेंसिक विशेषज्ञ को अदालत में पेश किया जाए। यह निर्णय एक चल रहे बलात्कार मामले में आया, जहाँ अभियोजन पक्ष ने आरोपी की पहचान स्थापित करने के लिए DNA साक्ष्य पर भरोसा किया था।
न्यायालय ने कहा कि विशेषज्ञ की प्रतिप्रश्न प्रक्रिया आवश्यक है ताकि परीक्षण की विधि, साक्ष्य की शृंखला और परिणामों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन किया जा सके। इस प्रकार की जांच के बिना DNA रिपोर्ट का प्रमाणिक मूल्य अनिश्चित रहता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आपराधिक मुकदमों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा को मजबूत करता है और भविष्य में अभियोजकों को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करेगा कि विशेषज्ञ गवाही के लिए तैयार हों। यह निर्णय वैज्ञानिक साक्ष्य के उपयोग में न्यायपालिका की निष्पक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
अदालत ने यह आदेश दिया कि मौजूदा DNA रिपोर्ट को रद्द नहीं किया जा रहा, परन्तु भविष्य में किसी भी फोरेंसिक साक्ष्य के साथ जिम्मेदार वैज्ञानिक की गवाही अनिवार्य होगी। यह कदम राज्य भर में यौन उत्पीड़न और अन्य आपराधिक मामलों में फोरेंसिक साक्ष्य के प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट का यह उल्लेख अन्य भारतीय हाई कोर्टों के पूर्व निर्णयों के अनुरूप है, जिन्होंने भी विशेषज्ञ की परीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि केवल प्रयोगशाला रिपोर्टों पर आधारित गलत सजा न दी जाए।
न्यायालय ने कहा कि विशेषज्ञ की प्रतिप्रश्न प्रक्रिया आवश्यक है ताकि परीक्षण की विधि, साक्ष्य की शृंखला और परिणामों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन किया जा सके। इस प्रकार की जांच के बिना DNA रिपोर्ट का प्रमाणिक मूल्य अनिश्चित रहता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आपराधिक मुकदमों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा को मजबूत करता है और भविष्य में अभियोजकों को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करेगा कि विशेषज्ञ गवाही के लिए तैयार हों। यह निर्णय वैज्ञानिक साक्ष्य के उपयोग में न्यायपालिका की निष्पक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
अदालत ने यह आदेश दिया कि मौजूदा DNA रिपोर्ट को रद्द नहीं किया जा रहा, परन्तु भविष्य में किसी भी फोरेंसिक साक्ष्य के साथ जिम्मेदार वैज्ञानिक की गवाही अनिवार्य होगी। यह कदम राज्य भर में यौन उत्पीड़न और अन्य आपराधिक मामलों में फोरेंसिक साक्ष्य के प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट का यह उल्लेख अन्य भारतीय हाई कोर्टों के पूर्व निर्णयों के अनुरूप है, जिन्होंने भी विशेषज्ञ की परीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि केवल प्रयोगशाला रिपोर्टों पर आधारित गलत सजा न दी जाए।