📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Original: Vyacheslav Argenberg
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राजनीति
गोवा के सीईओ ने एसआईआर के बाद मतदाता सूची में छूट को चुनौती देने वाले याचिका का विरोध किया
✍️ Prudent Media Goa
🗓 30 सित. 2026, 08:33 PM
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मुख्य कार्यकारी ने हालिया एसआईआर के बाद मतदाता सूची में छूट को चुनौती देने वाली याचिका का विरोध किया, इसे मतदान प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने वाला बताया।
गोवा स्थित एक संस्था के मुख्य कार्यकारी ने हालिया एसआईआर के बाद मतदाता सूची में छूट को चुनौती देने वाली याचिका के खिलाफ कड़ा विरोध व्यक्त किया है। यह याचिका स्थानीय अदालत में दायर की गई है और इसमें कहा गया है कि कई योग्य मतदाताओं को अद्यतन सूची से बाहर रखा गया, जिससे उनके मतदान अधिकार पर असर पड़ सकता है।
याचिका के अनुसार, सूची में छूट का कारण रोल‑अपडेट प्रक्रिया में हुई प्रक्रियात्मक चूक है, और याचिकाकर्ता ने आगामी चुनावों से पहले इस त्रुटि को सुधारने के लिए न्यायिक आदेश की मांग की है। इस मुद्दे को उठाने वाले यह तर्क दे रहे हैं कि छूट से मतदाता वर्ग का बहिष्कार हो सकता है।
मुख्य कार्यकारी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि रोल‑अपडेट सभी वैधानिक मानदंडों के अनुसार किया गया और इस याचिका से चुनाव के समय में अनावश्यक भ्रम पैदा हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस चरण में कानूनी हस्तक्षेप से सूची को अंतिम रूप देने में देरी हो सकती है और चुनाव की सुगमता पर असर पड़ सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अब अदालत दोनों पक्षों के तर्कों की जांच करेगी और यह तय करेगी कि कोई सुधारात्मक कदम आवश्यक है या नहीं। चुनाव की समयसीमा के करीब आते ही यह मामला समीक्षा के अधीन बना हुआ है।
याचिका के अनुसार, सूची में छूट का कारण रोल‑अपडेट प्रक्रिया में हुई प्रक्रियात्मक चूक है, और याचिकाकर्ता ने आगामी चुनावों से पहले इस त्रुटि को सुधारने के लिए न्यायिक आदेश की मांग की है। इस मुद्दे को उठाने वाले यह तर्क दे रहे हैं कि छूट से मतदाता वर्ग का बहिष्कार हो सकता है।
मुख्य कार्यकारी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि रोल‑अपडेट सभी वैधानिक मानदंडों के अनुसार किया गया और इस याचिका से चुनाव के समय में अनावश्यक भ्रम पैदा हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस चरण में कानूनी हस्तक्षेप से सूची को अंतिम रूप देने में देरी हो सकती है और चुनाव की सुगमता पर असर पड़ सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अब अदालत दोनों पक्षों के तर्कों की जांच करेगी और यह तय करेगी कि कोई सुधारात्मक कदम आवश्यक है या नहीं। चुनाव की समयसीमा के करीब आते ही यह मामला समीक्षा के अधीन बना हुआ है।