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गौरी गोपाल आश्रम में वृद्ध माँ की तेरहवीं एवं ब्रह्मभोज सम्पन्न, महाराज श्री ने निभाई पुत्रवत भूमिका
गौरी गोपाल आश्रम में रहने वाली एक वृद्ध माँ के देहावसान के 13वें दिन पूज्य महाराज श्री ने सनातन परंपरा के अनुसार विधि-विधानपूर्वक तेरहवीं एवं ब्रह्मभोज सम्पन्न कराया। महाराज श्री ने पुत्र की भांति अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए सभी संस्कारों को श्रद्धापूर्वक सम्पन्न कराया।
गौरी गोपाल आश्रम में रहने वाली एक वृद्ध माँ के निधन के 13वें दिन, पूज्य महाराज श्री ने सनातन परंपरा का पालन करते हुए विधि-विधानपूर्वक उनकी तेरहवीं एवं ब्रह्मभोज का आयोजन किया। इस अवसर पर उन्होंने एक पुत्र की भांति अपने कर्तव्य का निर्वहन किया और सभी आवश्यक संस्कारों को श्रद्धापूर्वक सम्पन्न कराया।
महाराज श्री का आश्रम में रहने वाली प्रत्येक वृद्ध माँ के प्रति गहरा अपनत्व, सेवा-भाव और पुत्रवत संबंध है। भले ही उनका रक्त का रिश्ता न हो, महाराज श्री ने सेवा, सम्मान और आत्मीयता से ऐसा संबंध स्थापित किया है, जहाँ प्रत्येक वृद्धा को माँ का दर्जा प्राप्त है। आश्रम में रहने वाली माताएँ उनके लिए अपने परिवार का हिस्सा हैं, जिनकी सेवा करना और उनके सुख-दुःख में साथ खड़ा रहना उनका परम कर्तव्य है।
यह भावना कि माँ के जीवित रहने तक उनकी सेवा और देखभाल करना, और उनके जीवन की यात्रा पूर्ण होने पर भी उनका सम्मान बनाए रखना और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना, महाराज श्री के कार्यों में स्पष्ट झलकती है। इसी भावना के साथ, इस वृद्ध माँ के देहावसान के पश्चात, अंतिम संस्कार से लेकर तेरहवीं एवं ब्रह्मभोज तक के सभी संस्कार अत्यंत श्रद्धापूर्वक सम्पन्न कराए गए। महाराज श्री ने एक पुत्र की भांति अपनी माँ के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाते हुए उन्हें भावभीनी अंतिम विदाई दी।
महाराज श्री का आश्रम में रहने वाली प्रत्येक वृद्ध माँ के प्रति गहरा अपनत्व, सेवा-भाव और पुत्रवत संबंध है। भले ही उनका रक्त का रिश्ता न हो, महाराज श्री ने सेवा, सम्मान और आत्मीयता से ऐसा संबंध स्थापित किया है, जहाँ प्रत्येक वृद्धा को माँ का दर्जा प्राप्त है। आश्रम में रहने वाली माताएँ उनके लिए अपने परिवार का हिस्सा हैं, जिनकी सेवा करना और उनके सुख-दुःख में साथ खड़ा रहना उनका परम कर्तव्य है।
यह भावना कि माँ के जीवित रहने तक उनकी सेवा और देखभाल करना, और उनके जीवन की यात्रा पूर्ण होने पर भी उनका सम्मान बनाए रखना और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना, महाराज श्री के कार्यों में स्पष्ट झलकती है। इसी भावना के साथ, इस वृद्ध माँ के देहावसान के पश्चात, अंतिम संस्कार से लेकर तेरहवीं एवं ब्रह्मभोज तक के सभी संस्कार अत्यंत श्रद्धापूर्वक सम्पन्न कराए गए। महाराज श्री ने एक पुत्र की भांति अपनी माँ के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाते हुए उन्हें भावभीनी अंतिम विदाई दी।