📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Unknown authorUnknown author
राजनीति
पूर्व मिज़ोरम सीएम ज़ोरमथंगा ने एएफएसपीए को ‘भयावह’ कहा
✍️ The Times of India
🗓 21 अग. 2026, 07:33 AM
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पूर्व मिज़ोरम मुख्यमंत्री ज़ोरमथंगा ने एएफएसपीए को ‘भयावह’ कहा, जिससे इस कानून के भविष्य पर चर्चा फिर से तेज हुई।
पूर्व मिज़ोरम मुख्यमंत्री ज़ोरमथंगा ने सशस्त्र बलों (विशेष अधिकार) अधिनियम (एएफएसपीए) को "भयावह" कहा, जिससे इस कानून के प्रति उनकी असंतुष्टि स्पष्ट हुई। उन्होंने मीडिया को दिया बयान में इस विधि की पुनः समीक्षा की मांग की, जो कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार प्रदान करती है।
एएफएसपीए, 1958 में लागू किया गया, लंबे समय से विवाद का विषय रहा है; आलोचक कहते हैं कि यह मानवाधिकार उल्लंघनों को बढ़ावा देता है, जबकि समर्थक इसे आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हैं। यह कानून सुरक्षा कर्मियों को बिना वारंट के गिरफ्तारी और विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग करने की अनुमति देता है।
ज़ोरमथंगा की आलोचना मानवाधिकार संगठनों, विपक्षी राजनेताओं और कई नागरिक समाज समूहों की आवाज़ों के साथ जुड़ती है, जिन्होंने इस अधिनियम की निरस्ती या संशोधन की मांग की है। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया है, परंतु उनके इस बयान से एएफएसपीए की संसद में पुनः जांच की संभावना बढ़ सकती है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कोई विशिष्ट विकल्प नहीं दिया, परंतु सुरक्षा चिंताओं और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन स्थापित करने वाले कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह बयान मिज़ोरम और राष्ट्रीय स्तर पर एएफएसपीए के भविष्य पर चर्चा को तेज़ कर सकता है।
जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ेगी, गृह मंत्रालय से इस अधिनियम के कार्यान्वयन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आने की उम्मीद है।
एएफएसपीए, 1958 में लागू किया गया, लंबे समय से विवाद का विषय रहा है; आलोचक कहते हैं कि यह मानवाधिकार उल्लंघनों को बढ़ावा देता है, जबकि समर्थक इसे आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हैं। यह कानून सुरक्षा कर्मियों को बिना वारंट के गिरफ्तारी और विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग करने की अनुमति देता है।
ज़ोरमथंगा की आलोचना मानवाधिकार संगठनों, विपक्षी राजनेताओं और कई नागरिक समाज समूहों की आवाज़ों के साथ जुड़ती है, जिन्होंने इस अधिनियम की निरस्ती या संशोधन की मांग की है। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया है, परंतु उनके इस बयान से एएफएसपीए की संसद में पुनः जांच की संभावना बढ़ सकती है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कोई विशिष्ट विकल्प नहीं दिया, परंतु सुरक्षा चिंताओं और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन स्थापित करने वाले कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह बयान मिज़ोरम और राष्ट्रीय स्तर पर एएफएसपीए के भविष्य पर चर्चा को तेज़ कर सकता है।
जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ेगी, गृह मंत्रालय से इस अधिनियम के कार्यान्वयन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आने की उम्मीद है।