📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Amiyashrivastava (talk) (Uploads)
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विधवा सौतेली माँ को सौतेले बेटों से रखरखाव का अधिकार दिया
✍️ LawBeat
🗓 26 अग. 2026, 10:18 PM
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बिना संतान वाली विधवा सौतेली माँ अपने सौतेले बेटों से रखरखाव की मांग कर सकती है, जिससे पारिवारिक कानून में नया मिसाल स्थापित हुई।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि बिना संतान वाली विधवा सौतेली माँ अपने सौतेले बेटों से रखरखाव की मांग कर सकती है। कोर्ट ने धारा 125 आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत यह स्पष्ट किया कि जब सौतेली माँ के पास अपना कोई समर्थन नहीं होता, तो सौतेले बेटे उसकी आर्थिक सहायता के दायित्व में आते हैं।
यह याचिका एक ऐसी विधवा द्वारा दायर की गई थी, जिसने अपने पति की मृत्यु के बाद उनके परिवार में प्रवेश किया और उसके कोई जैविक बच्चे नहीं थे। वह अपने ससुर के बेटों से नियमित आर्थिक सहायता की मांग कर रही थी, यह तर्क देते हुए कि वह कानून के तहत उनके आश्रित हैं।
कोर्ट ने उसकी पक्ष में निर्णय दिया और कहा कि सौतेले बेटों पर उसकी जीविका के लिए नैतिक और वैधानिक दायित्व है, विशेषकर जब उसके पास अन्य कोई साधन न हो। यह फ़ैसला रखरखाव के दायित्व को रक्त संबंधों से परे विस्तारित करने का संकेत देता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारत भर में समान मामलों में प्रभाव डाल सकता है, जिससे अदालतें सौतेले परिवार की गतिशीलता से जुड़े रखरखाव के दावों को पुनः देख सकती हैं। यह न्यायिक निर्णय कमजोर विधवाओं के अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका को भी उजागर करता है।
अब सौतेली माँ को कोर्ट द्वारा निर्धारित नियमित रखरखाव राशि मिलने का अधिकार है, और सौतेले बेटों को आदेश का पालन करने के लिए निर्देशित किया गया है।
यह याचिका एक ऐसी विधवा द्वारा दायर की गई थी, जिसने अपने पति की मृत्यु के बाद उनके परिवार में प्रवेश किया और उसके कोई जैविक बच्चे नहीं थे। वह अपने ससुर के बेटों से नियमित आर्थिक सहायता की मांग कर रही थी, यह तर्क देते हुए कि वह कानून के तहत उनके आश्रित हैं।
कोर्ट ने उसकी पक्ष में निर्णय दिया और कहा कि सौतेले बेटों पर उसकी जीविका के लिए नैतिक और वैधानिक दायित्व है, विशेषकर जब उसके पास अन्य कोई साधन न हो। यह फ़ैसला रखरखाव के दायित्व को रक्त संबंधों से परे विस्तारित करने का संकेत देता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारत भर में समान मामलों में प्रभाव डाल सकता है, जिससे अदालतें सौतेले परिवार की गतिशीलता से जुड़े रखरखाव के दावों को पुनः देख सकती हैं। यह न्यायिक निर्णय कमजोर विधवाओं के अधिकारों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका को भी उजागर करता है।
अब सौतेली माँ को कोर्ट द्वारा निर्धारित नियमित रखरखाव राशि मिलने का अधिकार है, और सौतेले बेटों को आदेश का पालन करने के लिए निर्देशित किया गया है।