🔥 TRENDING ਸਾਡੇ ਬਜ਼ੁਰਗ, ਸਾਡਾ ਮਾਣ' ਮੁਹਿੰਮ ਤਹਿਤ ਬਜ਼... સુરતની લાજપોર જેલમાં ગેરકાયદેકારીનો પર... Assam Expands Cancer Care Infrastructu... Guwahati’s Traditional Durga Idol Make... ABVP Workers Detained in Ranchi After... RBI Governor Sanjay Malhotra Delivers...
07 Oct 2026•
ગુજરાતી मराठी ਪੰਜਾਬੀ বাংলা
बिक्रम में अगस्त क्रांति की अनसुनी गाथा
Local

बिक्रम में अगस्त क्रांति की अनसुनी गाथा

✍️ Reporter: Ankit Raj 🗓 12 Aug 2026, 12:50 AM 👁 80
Share: 💬 WhatsApp 📘 Facebook 𝕏 Post

17 अगस्त 1942 को बिक्रम थाने पर तिरंगा फहराने निकले थे तीन किशोर, बुटाई राम और रंगनाथ सिंह ने भी दी जान

उम्र महज 15 साल... आंखों में आजाद भारत का सपना और दिल में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत। घरवालों ने आंदोलन में जाने से रोक दिया था, लेकिन देश को आजाद देखने का जुनून ऐसा था कि त्रिवेणी सिंह घर से निकल पड़े। नाश्ता किया और परिवार को बिना बताए अपने दो साथियों बुटाई राम और रंगनाथ सिंह के साथ अगस्त क्रांति के आंदोलन में शामिल हो गए। मकसद साफ था—बिक्रम थाना परिसर पर लहराते यूनियन जैक को उतारना और उसकी जगह तिरंगा फहराना। अंग्रेजी पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो त्रिवेणी ने सड़क किनारे पड़ा पत्थर उठाकर अंग्रेज कप्तान पर दे मारा। कप्तान घायल हुआ तो अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियां बरसा दीं। सिर में गोली लगते ही 15 साल का यह किशोर भारत माता की गोद में हमेशा के लिए सो गया। उसके साथ बुटाई राम और रंगनाथ सिंह भी शहीद हो गए।

यह कहानी है 17 अगस्त 1942 की, जब पटना सचिवालय में सात युवाओं की शहादत के कुछ ही दिन बाद अगस्त क्रांति की आग पटना के ग्रामीण इलाकों तक पहुंच चुकी थी। गांवों से निकलकर लोग बिक्रम की सड़कों पर जुट रहे थे। चारों तरफ आजादी के नारे गूंज रहे थे। ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के बीच लोगों का हुजूम बिक्रम थाने की ओर बढ़ रहा था।

## घरवालों ने रोका, लेकिन आजादी का जुनून नहीं रोक पाया

पटना जिला अंतर्गत दुल्हिन बाजार प्रखंड के काब निवासी त्रिवेणी सिंह भी इस आंदोलन का हिस्सा बनना चाहते थे। लेकिन उम्र कम होने के कारण परिवार के बड़े लोगों ने उन्हें घर से बाहर जाने से रोक दिया। बावजूद इसके, वह नहीं माने। परिवार के अनुसार, सुबह करीब आठ बजे उन्होंने घर पर नाश्ता किया और किसी को कुछ बताए बिना अपने साथियों बुटाई राम और रंगनाथ सिंह के साथ आंदोलन में शामिल होने निकल पड़े।

तीनों किशोर आंदोलनकारियों के साथ आगे बढ़ते हुए बिक्रम थाना के पास पहुंच गए। वहां अंग्रेजी पुलिस की तैनाती थी। अंग्रेज अधिकारी की नजर जैसे ही तीनों पर पड़ी, उन्हें रोकने की कोशिश शुरू हो गई। पुलिस उन्हें पीछे हटने के लिए कहती रही, लेकिन तीनों के कदम नहीं रुके।

इसी दौरान त्रिवेणी ने सड़क किनारे पड़ा एक पत्थर उठाया और अंग्रेज कप्तान की ओर फेंक दिया। पत्थर सीधे कप्तान के सिर में जा लगा। उसके सिर से खून निकलने लगा। इसके बाद वहां अफरा-तफरी मच गई। अंग्रेज सिपाहियों ने मोर्चा संभाला और आंदोलनकारियों पर गोली चला दी।

पहली गोली त्रिवेणी सिंह के सिर में लगी। वह वहीं गिर पड़े। इसके बाद चली गोलियों की चपेट में बुटाई राम और रंगनाथ सिंह भी आ गए। देखते ही देखते आजादी के तीन दीवाने अंग्रेजी गोलियों का शिकार हो गए। जिस उम्र में किशोर अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में इन तीनों ने देश के भविष्य के लिए अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया।

## शादी के तीन साल बाद शहादत, पत्नी ने जिंदगीभर ढोया इंतजार

त्रिवेणी सिंह की शहादत की कहानी में देशभक्ति के साथ एक ऐसा पारिवारिक दर्द भी छिपा है, जिसे परिवार आज तक नहीं भूल पाया है। उनके पोते सतेंद्र सिंह, सतीश कुमार और रामकिशोर शर्मा के अनुसार, त्रिवेणी सिंह की शादी शहादत से करीब तीन वर्ष पहले मुनाकी कुंवर से हुई थी।

उस दौर की सामाजिक परंपराएं ऐसी थीं कि विवाह के बाद भी कई पति-पत्नी एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देख पाते थे। परिवार के मुताबिक, त्रिवेणी सिंह भी अपनी पत्नी मुनाकी कुंवर का चेहरा नहीं देख सके। शादी के कुछ ही वर्षों बाद वह देश की आजादी के लिए शहीद हो गए।

जब त्रिवेणी की शहादत की खबर घर पहुंची तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। एक तरफ देश ने अपना वीर सपूत खोया, तो दूसरी तरफ परिवार ने अपना बेटा और मुनाकी कुंवर ने अपना पति। इसके बाद मुनाकी कुंवर ने पूरी जिंदगी शहीद की विधवा के रूप में गुजारी। करीब 53 साल कि उम्र में मुनाकी कुंवर की वर्ष 2001 में निधन हो गया। पीछे रह गई त्रिवेणी की शहादत की कहानी, जो आज परिवार की सबसे बड़ी विरासत है।

## बिक्रम शहीद चौक पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है नाम

आजादी के बाद त्रिवेणी सिंह जैसे स्थानीय शहीदों की कुर्बानी को सम्मान मिला। बिक्रम के शहीद चौक पर उनका नाम अमर शहीद के रूप में दर्ज है। हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को काब गांव सहित आसपास के लोग यहां पहुंचते हैं और त्रिवेणी सिंह, बुटाई राम, रंगनाथ सिंह समेत स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए वीरों को श्रद्धांजलि देते हैं।

बिक्रम शहीद स्मारक पर आज भी तिरंगा शान से लहराता है। स्मारक पर पहुंचने वाली नई पीढ़ी को 17 अगस्त 1942 की वह कहानी सुनाई जाती है, जब आजादी की चाह में तीन युवाओं ने अंग्रेजी हुकूमत की बंदूकों के सामने अपने सीने और हौसले दोनों तान दिए थे।

## आजादी की कीमत सिर्फ बड़े आंदोलनों ने नहीं चुकाई

त्रिवेणी सिंह की कहानी यह याद दिलाती है कि भारत की आजादी सिर्फ बड़े शहरों में हुए आंदोलनों और बड़े नेताओं के संघर्ष का परिणाम नहीं थी। इसकी नींव गांव-कस्बों में आम लोगों, किसानों, युवाओं और किशोरों के साहस से भी मजबूत हुई थी।

बिक्रम की धरती पर 17 अगस्त 1942 को बहा त्रिवेणी सिंह, बुटाई राम और रंगनाथ सिंह का खून उस दौर के उन अनगिनत गुमनाम बलिदानों की कहानी कहता है, जिनके कारण आज देश की धरती पर तिरंगा शान से लहरा रहा है। महज 15 वर्ष की उम्र में शहादत देने वाला त्रिवेणी सिंह आज भी बिक्रम की स्मृतियों में जिंदा है—एक ऐसे किशोर के रूप में, जिसने अपनी जिंदगी से ज्यादा देश की आजादी को महत्व दिया।

अमर शहीद त्रिवेणी सिंह : एक नजर में

नाम : त्रिवेणी सिंह( छात्र)

पिता : बलकेश सिंह(किसान)

पत्नी : मुनाकी कुंवर

जन्म : 1927

गांव : काब, दुल्हिन बाजार ( पटना )

उम्र : करीब 15 वर्ष

समय : भारत छोड़ो आंदोलन, 1942

मकसद : बिक्रम थाना परिसर में तिरंगा फहराना

शहादत : अंग्रेजी पुलिस की गोली से शहीद

स्मृति : बिक्रम शहीद चौक पर नाम अंकित

श्रद्धांजलि : प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को
📲Get App