बिजली की झालरों से मिट्टी के दीयो ं की मांग घटी: करौली में कुंभकारों के पुश्तैनी कारोबार पर संकट, लागत निकालना भी हुआ मुश्किल
करौली में बिजली की झालरों और रंग-बिरंगी लाइटो ं के चलन से मिट्टी के दीयो ं की मांग घट रही है। इसस े कुंभकारों के पुश्तैनी कारोबार और कमाई पर असर पड़ा है।
जिले में दर्जनो ं परिवार पीढ़ियो ं से मिट्टी के दीये, हांडी, फव्वारे और सजावटी सामान बना रहे हैं। कुंभकार जीतू ने बताया कि पहले दीपावली के समय अच्छी कमाई होती थी, लेकिन अब बिजली की झालरों और चाइनीज लाइटो ं के कारण बाजार बदल गया है।
दीया बनान े के लिए पहले मिट्टी खरीदी जाती है। उस े छानकर कंकड़-पत्थर अलग किए जाते हैं, फिर पानी मिलाकर गूंथा जाता है। इसके बाद चाक पर आकार देकर सुखाया जाता ह ै और भट्टी में पकाया जाता है।
लागत निकालना भी हुआ मुश्किल
कुंभकार रामवीर के मुताबिक, एक ट्रॉली मिट्टी करीब 10 हजार रुपए में मिलती है। लकड़ी और दूसरी सामग्री पर भी खर्च होता है। इसके बावजूद बाजार में 100 दीयो ं के सिर्फ 50 से 60 रुपए मिलते हैं। ऐस े में लागत निकालना मुश्किल
जिले में दर्जनो ं परिवार पीढ़ियो ं से मिट्टी के दीये, हांडी, फव्वारे और सजावटी सामान बना रहे हैं। कुंभकार जीतू ने बताया कि पहले दीपावली के समय अच्छी कमाई होती थी, लेकिन अब बिजली की झालरों और चाइनीज लाइटो ं के कारण बाजार बदल गया है।
दीया बनान े के लिए पहले मिट्टी खरीदी जाती है। उस े छानकर कंकड़-पत्थर अलग किए जाते हैं, फिर पानी मिलाकर गूंथा जाता है। इसके बाद चाक पर आकार देकर सुखाया जाता ह ै और भट्टी में पकाया जाता है।
लागत निकालना भी हुआ मुश्किल
कुंभकार रामवीर के मुताबिक, एक ट्रॉली मिट्टी करीब 10 हजार रुपए में मिलती है। लकड़ी और दूसरी सामग्री पर भी खर्च होता है। इसके बावजूद बाजार में 100 दीयो ं के सिर्फ 50 से 60 रुपए मिलते हैं। ऐस े में लागत निकालना मुश्किल