Local
भाईयों के बीच जायदाद विवाद से घर की बर्बादी, कचहरी में करोड़ों की लड़ाई
दो भाई जो पहले मिलकर पहाड़ तोड़ते थे, अब दो गज जमीन के लिये कचहरी में करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।
भाई‑भाई के बीच जायदाद और पैसे का विवाद कैसे घर को बर्बाद कर देता है, इसका हालिया मामला सामने आया है। दो भाई जो पहले मिलकर पहाड़ तोड़ते थे, अब दो गज जमीन के लिये कचहरी में करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब घर में आय‑व्यय का लेखा‑जोखा मौखिक रूप से चलता रहा और लिखित रूप में कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया। एक भाई शहर में नौकरी करके घर को नियमित रूप से धन भेजता रहा, जबकि दूसरा गाँव में रहकर जमीन‑जायदाद का प्रबंधन करता रहा, दोनों को लगा कि वे अधिक योगदान दे रहे हैं।
विवाह के बाद दोनों के अपने‑अपने परिवार और बच्चों के साथ संयुक्त खाते में दरार आने लगी। माता‑पिता भावनात्मक रूप से प्रभावित होकर स्पष्ट बंटवारा नहीं कर पाए, जिससे उनके निधन के बाद भाई आपस में खून‑प्यासे हो गए। वकील और बिचौलिए ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए दस साल तक मुकदमा चलाया और जायदाद की आधी कीमत स्वयं ले ली।
इस प्रकार न केवल पारिवारिक धंधा और प्रतिष्ठा धूमिल हुई, बल्कि अगली पीढ़ी के बच्चों में भी विष फैल गया। विशेषज्ञों का कहना है कि भाई‑भाई के बीच प्रेम बना रहे, पर व्यापार और पैसे का हिसाब पहली ही दिन से लिखित रूप में तय होना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न उत्पन्न हों।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब घर में आय‑व्यय का लेखा‑जोखा मौखिक रूप से चलता रहा और लिखित रूप में कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया। एक भाई शहर में नौकरी करके घर को नियमित रूप से धन भेजता रहा, जबकि दूसरा गाँव में रहकर जमीन‑जायदाद का प्रबंधन करता रहा, दोनों को लगा कि वे अधिक योगदान दे रहे हैं।
विवाह के बाद दोनों के अपने‑अपने परिवार और बच्चों के साथ संयुक्त खाते में दरार आने लगी। माता‑पिता भावनात्मक रूप से प्रभावित होकर स्पष्ट बंटवारा नहीं कर पाए, जिससे उनके निधन के बाद भाई आपस में खून‑प्यासे हो गए। वकील और बिचौलिए ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए दस साल तक मुकदमा चलाया और जायदाद की आधी कीमत स्वयं ले ली।
इस प्रकार न केवल पारिवारिक धंधा और प्रतिष्ठा धूमिल हुई, बल्कि अगली पीढ़ी के बच्चों में भी विष फैल गया। विशेषज्ञों का कहना है कि भाई‑भाई के बीच प्रेम बना रहे, पर व्यापार और पैसे का हिसाब पहली ही दिन से लिखित रूप में तय होना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न उत्पन्न हों।