📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / NASA, ESA, and J. Lotz (STScI)
विज्ञान
झारखंड में मिला 3.5 अरब साल पुराना पत्थर, हो सकता है जीवन के सबसे पुराने संकेत
✍️ Business Standard
🗓 21 अग. 2026, 09:19 AM
👁 3
भूवैज्ञानिकों ने झारखंड में 3.5 अरब साल पुराना एक पत्थर पाया है, जिसमें पृथ्वी पर जीवन के सबसे पुराने संकेत हो सकते हैं, बिजनेस स्टैंडर्ड ने बताया।
झारखंड के खनिज‑समृद्ध क्षेत्रों में काम कर रहे भूवैज्ञानिकों ने लगभग 3.5 अरब साल पुराना एक पत्थर खोजा है, जो अर्चियन युग से संबंधित है। यह नमूना नियमित सर्वेक्षण के दौरान मिला और रेडियोमेट्रिक डेटिंग से इसकी आयु की पुष्टि हुई।
प्रारम्भिक जांच में यह संकेत मिला है कि इस पत्थर में सूक्ष्म संरचनाएँ या रासायनिक संकेत हो सकते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन के सबसे प्रारम्भिक रूपों से मेल खाते हैं। यदि यह पुष्टि हो जाती है, तो यह जीवित पदार्थ के उद्भव की समयसीमा को कई सौ मिलियन साल आगे बढ़ा सकता है।
वैज्ञानिक अब विस्तृत माइक्रोस्कोपी और आय isotopic विश्लेषण कर रहे हैं ताकि यह तय किया जा सके कि ये विशेषताएँ वास्तव में जैविक हैं या नहीं। इस खोज ने शोध समुदाय का विशेष ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि यह प्रारम्भिक पृथ्वी के विकास मॉडल को पुनः परिभाषित कर सकती है।
यह खोज बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा पहली बार रिपोर्ट की गई, जो क्षेत्रीय भूविज्ञान और व्यापक अंतरिक्ष जीवविज्ञान (अस्ट्रोबायोलॉजी) दोनों पर संभावित प्रभाव को उजागर करती है। आगे के अध्ययन के परिणामों को वैज्ञानिक जर्नलों में प्रकाशित किया जाएगा।
प्रारम्भिक जांच में यह संकेत मिला है कि इस पत्थर में सूक्ष्म संरचनाएँ या रासायनिक संकेत हो सकते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन के सबसे प्रारम्भिक रूपों से मेल खाते हैं। यदि यह पुष्टि हो जाती है, तो यह जीवित पदार्थ के उद्भव की समयसीमा को कई सौ मिलियन साल आगे बढ़ा सकता है।
वैज्ञानिक अब विस्तृत माइक्रोस्कोपी और आय isotopic विश्लेषण कर रहे हैं ताकि यह तय किया जा सके कि ये विशेषताएँ वास्तव में जैविक हैं या नहीं। इस खोज ने शोध समुदाय का विशेष ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि यह प्रारम्भिक पृथ्वी के विकास मॉडल को पुनः परिभाषित कर सकती है।
यह खोज बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा पहली बार रिपोर्ट की गई, जो क्षेत्रीय भूविज्ञान और व्यापक अंतरिक्ष जीवविज्ञान (अस्ट्रोबायोलॉजी) दोनों पर संभावित प्रभाव को उजागर करती है। आगे के अध्ययन के परिणामों को वैज्ञानिक जर्नलों में प्रकाशित किया जाएगा।